Tuesday, June 30, 2026

आखिर क्यों छुपाए सरकार ने षहीदों के नाम ???

देष के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले षहीदों के नाम भी सरकार छुपा सकती है संसद में झूठ बोल सकती है यकीन नहीं होता !!!! पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारत की ओर से मई 2025 में चलाएं गए ‘‘ऑपरेषन सिंदूर‘‘ के दौरान 6 जवान षहीद हुए थे बीते षनिवार को पहली बार इसकी अधिकारिक घोषणा की गई। साढ़े तेरह महिने बाद नई दिल्ली स्थित नेषनल वॉर मेमोरियल के ‘ त्याग चक‘‘ की षिलाओं पर इन जवानों के नाम अंकित किए गए है। हर वक्त खुद को देषभक्त कहने वाली सरकार ने ऐसा कारनामा कर दिया है जिससे उनकी देषभक्ति पर ही सवालियां निषान लग रहें है। 7 मई 2025 को षुरू हुआ ऑपरेषन सिंदूर को आपसी समझौते के बाद 10 मई 2025 को संघर्ष विराम कर दिया गया। ऐसा नहीं है कि षहादत का जिक्र नहीं हुआ, जिक्र हुआ था लेकिन अधिकारिक घोषणा से बचा गया । संघर्ष विराम के बाद 13 मई को प्रधानमंत्री पंजाब के आदमपुर एयरबेस पर गए वहां भी पीएम ने किसी जवान कीष्षहादद का जिक्र तक नहीं किया । फिर 29 मई को पटना में जीत का जष्न मनाते हुए रोड षो किया लेकिन जवानों का जिक्र नहीं । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 28 जुलाई 2025 को संसद में बयान दिया और झूठ बोला कि किसी जवान को क्षति नहीं हुई । जंग के समय ही षहीदों के नाम सार्वजनिक करने और इतने महिने बीत जाने बाद बताने में बहुत फर्क है। यहीं नहीं देष के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों को तमाम अधिकार मिलने चाहिए लेकिन उस वक्त अग्निवीर एम मुरली नाइक के परिवार को पेंषन और वेलफेयर के अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। यह बहुुत अफसोस की बात है कि सरकार अग्निवीर और सामान्य भर्ती से आएं र्सैनिकों को मिलने वाली पेंषन में फर्क करती है और अदालत भी इस पर मोहर लगा देती है। कितने मंत्री कई तरह की पेंषन लेते है लेकिन यह सरकार देष के लिए जान गंवाने वाले सैनिक को आजीवन पेंषन तक नहीं दे सकती। रक्षा मंत्री संसद में सफेद झूठ बोल गए अन्य मंत्री उनके बयान पर ताली बजाते रहे। उस वक्त उन परिवारों पर क्या बीती होगी , जिन्हेाने अपने सपूत को खोया। जो सरकार षहीदों को पंेषन नहीं दे सकती उनकी षहादत को सार्वजनिक नहीं कर सकती तो फिर कैसे सरकार सेना के ऑपरेषन पर वाहवाही लूट सकती है ??? 11 मई को डीजीएमओ की प्रेस कॉफ्रेंस हुई जिसमें जवानों को श्रद्ांजलि दी गई , लेकिन सवाल उठता है कि षहीदों के नाम तक नहीं लिए गए। सरकार का यह रवैया साफ बताता है कि सरकार को अपनी छवि की अधिक चिंता थी ना कि सेना के षौर्य का उल्लेख करने की । इसीलिए जब राइफलमैन सुनील कुमार को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया लेेकिन समारोह में भी ऑपरेषन सिंदूर का नाम तक नहीं लिया गया । जिस ऑपरेषन पर सरकार अपनी पीठ थपथपाती नहीं थक रहीं थी उस ऑपरेषन में अपना बलिदान देने वाले षहीदों के नाम आखिर सरकार क्यों छुपाती रहीं क्या यह उनके बलिदान का अपमान नहीं है??? देष के लिए अपना सर्वेस्व बलिदान कर देने वाले सैनिकों के नाम बताने में सरकार को आखिर क्या परेषानी है ??? गलवान के समय से ही सरकार षहीदों की षहादत को छुपाती आ रहीं है ।

Wednesday, June 7, 2023

झकझौरता है महिला पहलवानों का न्याय के लिए संघर्ष

झकझौरता है महिला पहलवानों का न्याय के लिए संघर्ष विदेषों में भारत की ष्षान बढाने वाले हमारे खिलाडियों के साथ सरकार ने जैसा भद््दा व्यवहार किया उसे हम सभी को याद रखना चाहिए और वक्त आने पर सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। महिनों तक तपती धूप में हमारे खिलाडी टैंट लगाकर न्याय की आस में बैठे रहे एक ऐसे बाहुबली नेता के खिलाफ जिसके खिलाफ पहले से ही डकैती, मर्डर, चीटिंग , जालसाजी और भूमाफिया जैसे संगीन अपराध के 38 से ज्यादा मामले दर्ज है। इस नेता के खिलाफ जब महिला पहलवानो ने यौनषोषण मामले की एफआईआर दर्ज कराना चाहा तो पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की, सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद एफआईआर हो पाई थी। इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए जब इन अंतराष्ट्रीय खिलाडियों को इतनी यातना सहनी पडी तो एक आम लडकी होती तो कभी बाहर आ ही नहीं पाती। ऐसी है हमारी पुलिस व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया । अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में सांसद बृजभूषण सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर की विस्तृत खबर छपने के बाद उसके पाठकों तक सच्चाई पहुंची। इस रिपोर्ट को पढकर कोई भी इस मामले पर निष्पक्ष जांच की मांग करेगा। रिपोर्ट में ऐसी - ऐसी बातें है कि आप लडकियों के संघर्ष को समझ पाएंगे। पहलवानों के समर्थन में अभिनव बिंद्रा और नीरज चोपडा ष्षुरूआत से ही है लेकिन 1983 विष्वकप विजेता टीम के खिलाडियों ने संघर्षरत खिलाडियों को समर्थन देकर जता दिया है कि अभी इंसानियत मरी नहीं है और एक चैंपियन टीम खिलाडियों के दर्द को समझती है। वहीं भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिहं धोनी, विराट कोहली जैसे खिलाडियों ने पहलवानों के पक्ष में अभी तक कोई बात नहीं रखकर निराष ही किया है। ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर में खिलाडियों के बयान के साथ कोच, रेफरी और परिवारजनों की गवाही भी है षिकायत से स्पष्ट है कि यौन उत्पीडन के मामलों की जानकारी खेल मंत्री और प्रधानमंत्री को भी दी गई थी। इतना कुछ इस मामले में दबा हुआ था और मीडिया पहलवानों ही गलत साबित करने में लगा हुआ था। यहीं नहीं जब पुलिस ने जंतर - मंतर से खिलाडियों के धरने को जबरन खत्म करवाया तो कई मीडिया संस्थानों और अखबारों ने ऐसे प्रचार किया जैसे खिलाडियों ने स्वेच्छा से धरना खत्म किया है। अब जब खिलाडी थककर अपनी ड्यूटी पर लौट गए है तो उनका माखौल उडाया जा रहा है। इसके विपरीत खाप नेताओं ने उनका साथ दिया जब खिलाडी अपनी कोषिषों से हारकर अपना मेडल गंगा में प्रवाहित करने जा रहे थे तब राकेष टिकैत ने आगे आकर उनका साथ दिया और मेडल प्रवाहित होने करने से रोका, क्या सरकार का कोई भी मंत्री एक ट्वीट कर खिलाडियों को कम से कम मेडल प्रवाहित करने से रोक नहीं सकता था। जब खिलाडी यहीं मेडल जीतकर लाएं थे तब प्रधानमंत्री जी ने उनके साथ अपनी ली गई फोटो सांझा करने में देर नहीं की थी तो क्या अब प्रधानमंत्री जी की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि कम से कम उन्हें आष्वासन देते हुए एक ट्वीट ही कर देते, जबकि यौनषोषण के संबंध में प्रधानमंत्री जी को पहले से ही जानकारी थी बावजूद इसके प्रधानमंत्री जी पहलवान बेटियों के पक्ष में एक बात भी नहीं कह सकें और अपने आरोपी सांसद को संसद के नए भवन के उदघाटन कार्यक्रम में बुलाकर उनके साथ होने का सबूत देते रहे। बेटी बचाओ - बेटी पढाओं का नारा देने वाली सरकार के मुखिया ने बेटियों को बचाने के लिए आगे कदम ेक्यों नहीं बढाएं आखिर किस ताकत ने उनके कदम पीछे खींच दिए? साफ है कि जब इतनी स्पष्टता होने के बावजूद इन अंतराष्ट्रीय खिलाडियों को न्याय नहीं मिल पा रहा है तो बेटियों की सुरक्षा के लिए गढे जाने वाले सरकारी बयान सिवाए जुमले के और कुछ नहीं है। लेखक और वकील विराग गुप्ता ने दैनिक भास्कर में अपने लेख में जो लिखा है वह बिल्कुल सही है कि ब्रजभूषण सिंह की गिरफ्तारी नहीं होने से साफ है कि सरकार के हाथ कानून से भी लंबे है।

Wednesday, May 20, 2020

महामारी में सरकार की निष्ठुरता जग जाहिर पूर्व नियोजन के बिना लगाया लाॅकडाॅउन

औरंगाबाद में मालगाड़ी से कटे 16 प्रवासी मजदूर, और्रया सड़क हादसे में 24 मजदूरों की दर्दनाक मौत हादसे थमें नहीं है और ना ही मजदूरों के पैर थमे है। अभी भी देषभर के अलग- अलग हिस्सों से मजदूरों के सड़कों पर चलने की तस्वीरें दिखाई दे रहीं है। मजबूर मजदूरों की इस अंतहीन व्यथा के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार व तमाम राज्य सरकारें है। आखिर इन मजदूरों की गिनती सरकार के लिए नागरिकों में है भी या नहीं । जिस तरह की दर्दनाक, रूला देने वाली मजदूरों की दांस्ताने दुनिया के सामने है। विभिन्न सामाजिक संस्थाएं व समाजसेवी जन अपनी ओर से इन मजदूरों के खाने- पीने का इंतजाम कर रहे है। लेकिन सरकारे निष्ठुरता की हदे पार कर रहीं है। प्रषासन मजदूरों के षवों और घायलों को एक साथ भेजने जैसी असंवेदनहिनता का दर्षन करा रहा है। मजदूरों की हादसों में मृत्यु होने के बाद चैतरफा विरोध होने के बाद सरकारे अपनी कुर्सी बचाने के लिए झूठी संवेदनषीलता का प्रदर्षन कर मजदूरों को और परेषान कर रहीं है। उन्हें राज्यों की बाॅर्डर पर रोका जा रहा है। कुछ बसें व ट्रेन चलाकर उन्हें घरो तक पहुंचाने की कमजोर कोषिषेकी जा रहींहै । पैदल चलते मजदूर महामारी की पहचान कोविड - 19 जैसी महामारी को लेकर सरकार की योजनाएं पूर्णतया असफल रहीं है। नोटबंदी की तरह अचानक देषभर में लाॅकडाउन घोषित कर दिया गया। उस समय सरकार ने इन आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। तमाम जगद्दोजहत व परेषानियां झेलते हुए एक - दो नहीं हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाते मजदूर इस संकट की सबसे दर्दनाक तस्वीर है। क्या सरकरों को इनकी कोई जानकारी नहीं थी ? क्या सरकार को नहीं पता था कि ये लोग दिहाड़ी मजदूरी करते है? प्रधानमंत्री ने कहा था कि घर पर रहिए, घर पर रहिए और सिर्फ घर पर ही रहिए। तब प्रधानमंत्री जी नहीं जानते थे कि देषभर में प्रवासी मजदूर किस तरह से एक घर में किराए से कितनी मुष्किल में रहते है। तो सिर्फ घर पर किस प्रकार रह सकते है ? क्या सरकार ने तमाम मकानमालिकों से इस बात के लिए लिखित दस्तावेज लिए थे कि वे इस मुष्किल घड़ी में अपने किराएदारों से किराया नहीं मांगेंगे या मजदूरों के लिए पहले से रहने के अन्य व्यवस्थित इंतजाम किए थे ? कंेद्र व राज्य सरकारों ने जरूरतमंदों के लिए कुछ नहीं किया । बिना तैयारी के बस लाॅकडाॅउन घोषित कर दिया। जबकि यदि मार्च के षुरूआती दौर में ही इन तमाम मजदूरों को व्यवस्थित ढंग से ट्रेनों व बसों के माध्यम से अपने - अपने घर पहुंचाया जा सकता था। सरकार ने मजदूरों के प्रति घोर लापरवाही व गैर जिम्मेदारी का प्रदर्षन किया जिसका खामियाजा मजदूरों के मासूम बच्चों, गर्भवती महिलाओं व स्वयं मजदूरों को भोगना पड़ रहा है। महामारी से तो नहीं लेकिन मजदूर भुखमरी व हादसों के षिकार अधिक हो रहे है। लाषों के लिए ट्रेनें चलाई लाॅकडाॅउन लगाने के बाद जब षुरूआत में मजदूर पैदल चलते दिखे और सोषल मीडिया सहित कुछ मीडिया संस्थानों ने इनके संबंध में बात करना षुरू किया । जैसे - जैसे मजदूरों की व्यथा उजागर हुई तो कुछ जगहों से बसों की सुविधा षुरू की गई लेकिन बाद में उसे बंद कर दिया । लाॅकडाॅउन के चरण बढ़ते चले गए और मजबूर मजदूर वापस पैदल चलने को मजबूर हो गए। फिर वे हादसों का षिकार होने लगे बाद में प्रषासन ने उनके षवों को ट्रेन से पहुंचाने का काम किया । अगर पहले ही उनके लिए अधिक से अधिक वाहनों का प्रबंध कर दिया जाता तो इनती भयावह स्थितियों का षिकार होने से मजदूर बच जाता। अभी भी सरकारे मजदूरों की मदद के लिहाज से नहीं अपने कुप्रषासन के चेहरे को छिपाने के लिए मजदूरों को जगह - जगह रोककर उनके लिए बसों के प्रबंधन करने की बाते कर रहीं है। मंगलवार को भी बांद्रा में मजदूरों की भारी भीड़ उमड़ आई , गाजीपूर बाॅर्डर पर भी भारी संख्या में प्रवासी मजदूर इकट्ठा हुए। यानि सरकार के वर्तमान प्रयास भी मजदूरों की संख्या के हिसाब से नाकाफी साबित हुए है। बसों पर राजनीति बेबस मजदूर की आंखों में बस किसी तरह अपने गांव पहुंच जाने की बेबसी है। मजबूर मजदूरों पर हो रहीं खोखली राजनीति से बेखबर मजदूर अपने गंतव्य तक पहुंचने की नाकाम कोषिषे कर रहा है। मजदूरो को तुरंत मदद करने के बजाएं फिलहाल बसों को लेकर राजनीति करने में नेतागण व्यस्त है। पिछले 55 दिनों से प्रवासी मजदूरों की पैदल चलने व छुपते छुपाते किसी तरह अपने घर पहुंचने और हादसों के षिकार होेने की तस्वीरे सामने आने के बाद कांग्रेस ने प्रवासी मजदूरों के लिए एक हजार बसों का इंतजाम करने की इजाजत यूपी सरकार से पत्र के माध्यम से मांगी। प्रियंका गांधी ने यूपी सरकार को इस बाबत पत्र लिखा इसके बाद भाजपा ने सहमति देकर पत्राचार की राजनीति की षुरूआत कर दी । सहमति देने के बाद बसों का फिटनेस, लाइसेंस जैसे कागजी बातों के जरिए अडंगा लगाना षुरू कर दिया। कागजी राजनीति जारी है और बसों के पहिए थमे हुए है। बेवजह खींजती दिखीं वित्त मंत्री बीस लाख हजार करोड़ के पैकेज का विस्तृत विवरण देने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लगातार चार दिनों तक प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ी। अंतिम प्रेस कांफ्रेंस के दिन राहुल गांधी पर पूछे गए एक सवाल पर उन्हें इतना गुस्सा आ गया जिसने सरकार की नाकामयाबियों के नकाब को उतार दिया। खींजते हुए उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने सड़क किनारे बैठे मजदूरों से बात कर उनका समय खराब कर दिया। इससे तो अच्छा होता कि वे उनका सामान लेकर उनके साथ पैदल चलते। उनके लिए बसों का इंतजाम करते । कह तो इस तरह रहीं थी जैसे ना जाने कितने भाजपाई अभी तक मजदूरों का सामान उठाने में मदद कर चुके हो । अब जब प्रियंका गांधी ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया तो प़त्राचार की राजनीति षुरू कर दी। राहुल गांधी के प्रष्न पर निर्मला सीतारमण की खींज ने सबकुछ उजागर कर दिया है। साफ है कि प्रवासी मजदूरों की वास्तविक तस्वीर हर आम आदमी का दर्द बनती जा रहीं है और उनकी तरफ सरकार की लापरवाही , कुव्यवस्था उजागर हो चुकी है।

Wednesday, May 13, 2020

मजबूर मजदूर पर चुप्पी साधे रहे प्रधानमंत्री , पैदल अपने गांव जा रहे मजदूर आत्मनिर्भरता की मिसाल

महामारी के बाद मजबूर हुए मजदूरों की पीड़ादायक अंतहीन समस्याओं को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अभिभाषण में कुछ नहीं कहा। लाॅकडाउन के बाद देषभर में मजदूरों का पलायन जारी है । पलायन के इस दौर में मजदूर की पीड़ा के झकझौर देने वाली तस्वीरे रोज न्यूज चैनलों व अखबारों के माध्यम से देख रहे है। औरंगाबाद हादसे में जान गंवाने वाले मध्यप्रदेष के 16 मजदूरों को देष भूला नहीं है। अभी भी रोज कोई न कोई मजदूर भूख, गर्मी व दुर्घटना में दम तोड़ रहा है। 40 - 45 डिग्री तापमान में गर्भवती महिलाएं, मासूम बच्चे हजारों किलोमीटर की यात्राएं कर रहे है। भरी गर्मी में भी कई मजदूर पैदल चल रहे है तो कई अपना सामान बेचकर , कहीं से पैसा उधार लेकर किराए पर गाड़ी करके अपने गंतव्य की ओर निकल पड़े है। हालात से मजबूर इन मजदूरों पर चैतरफा मार पड़ रहीं है। हालात के मारे मुंबई के भिवंडीे से लखनउ के लिए निकले मजदूरों ने एक टैंपों किया जिसमें करीब 19 मजदूर फंसकर जैसे तैसे बैठे। कुछ दूर आगे चलकर मुंबई में ही हाईवे पर जा रहीं तेज रफतार कार ने टैंपों को पीछे से टक्कर मार दी जिसमें ड्राइवर और उसके परिवार की मौत हो गई। इसी तरह दिल्ली से लखनउ जाने के लिए साइकिल पर निकले मजदूर को एक कार ने पीछे से टक्कर मार दी उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इसी तरह फतहपुर से निकले एक मजदूर की रायबरेली में मौत हो गई। वहीं कुछ ऐसे भी है जिनके प्राण अपने गृह ग्राम में जाकर निकल गए। सोचिए क्या बीत रहीं होगी इन मजदूरों के परिवारों पर जानवरों की तरह ट्रकों में भरकर , तमाम परेषानियों से जूझते हुए , बचा कुचा सबकुछ बेचकर सिर्फ अपने गांव की ओर निकले मजदूरों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक षब्द तक नहीं बोला ? ठीक है आपने 20 हजार करोड़ के आर्थिक पैकेज की धोषणा कर दी लेकिन इसका फायदा आज सड़कों पर चल रहे मजदूरों को तो नहीं मिलेगी और ना ही उन्हें इस घोषणा के बारे में कुछ पता होगा । फिलहाल फौरी तौर पर उनके लिए प्रधानमंत्री क्या कर रहे है इसके बारे में कुछ भी उन्होंने नहीं कहा। हर तरफ से मार खा रहे मजदूरों को लेकर आपकी वर्तमान में क्या योजना है इसके बारे में आपने अपनी नीति स्पष्ट नहीं की। प्रधानमंत्री ने अपने अभिभाषण में कहा कि अब योजनाओं का पूरा लाभ लाभार्थियों तक पहुंचता है लेकिन धरातल पर ऐसा होता तो नहीं दिख रहा । जिस वक्त लाॅकडाउन की षुरूआत हुई थी उस वक्त सरकार ने और रिजर्व बैंक ने कहा था कि देष में खाद्यान की कोई कमी नहीं है। लेकिन सड़कों पर हजारों किलोमीटर पैदल चलते मजदूरों को देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि उन्हें राषन मुहैया कराया गया होगा? खाने - पीने और सुरक्षा की व्यवस्था होती तो कौन मजदूर अपनी जान पर खेलकर इतना लंबे सफर के लिए इस तरह निकल पड़ते। यहीं नहीं गर्भवती महिलाएं जिनका 8 वां 9 वां महिना चल रहा है। चिलचिलाती धूप में बिना पानी , खाने के लिए बस लगातार चली जा रहीं है। रायपुर से ऐसी तस्वीर सामने आई जिसमें महिला ने सड़क पर बच्चे को जन्म दिया दो घंटे के विश्राम के बाद मजदूरों का दल अपने गंतव्य के लिए फिर रवाना हो गया । नवजात बच्चे को लेकर मां फिर हजारों मील की यात्रा के लिए पैदल चल पड़ी। 20 हजार करोड़ के आर्थि क पैकेज का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री को अर्थव्यवस्था की नींव मजदूरों की याद नहीं आई। सूरत में हजारों की तादात में मजदूर लगभग रोज विरोध के लिए सड़कों पर उतर रहे है। सोमवार को तो तमाम मजदूर हाथ में घर पहुंचाने से जुड़े बैनर लेकर विरोध प्रदर्षन करते नजर आएं। लेकिन राज्य सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहीं है। कई किलोमीटर की यात्रा तय कर मप्र पहुंचे मजदूरों को महाराष्ट्र और मप्र की बाॅर्डर पर रोक दिया गया। चिलचिलाती धूप में मजदूर परेषान होते रहे। आखिर सारे जुल्म मजदूरों पर ही क्यों ढाएं जा रहे है। कालाबाजारी करने वाले भी मजदूरों से पैसा वसूल रहे है दो हजार की साइकिल 4 हजार में दे रहें है। अपनी गाड़ी में बैठाने के लिए मनमाना किराया वसूल कर रहे है। अपना सबकुछ लूटा - पिटा कर जैसे - तैसे घर पहुंच रहे मजदूरों को भी आसानी से गांव में घुसने नहीं दिया जा रहा है। कई मजदूरों को उनके गांव के बाहर ही रोक दिया गया है । छोटे बच्चे है उनके लिए दूध पानी तक का प्रबंध नहीं हएो पा रहा है। लाखों मजदूरों की अंतहीन पीड़ा दायक कहानियां चारों तरफ है जहां देखेंगे उनकी ऐसी समस्याएं नजर आएंगी आपकी नजरें षर्म से झुक जाएंगी। इसलिए यदि किसी काम से घर से निकले हाथ में एक थैले में पानी , कुछ खाने का सामान , चप्पल साथ लेकर निकले यदि कोई मजदूर दिखे तो उसकी इतनी मदद तो कर सकें। चल - चल कर उनकी चप्पलें घिस गई है ऐसी तस्वीरें आई थी जिसमें मजदूर ने प्लास्टिक की बाटल को पैर के नीचे रखकर सफर किया था। मजदूरों की इन भयावह , पीड़ादायक समस्याओं का मजदूर तुरंत समाधान चाहता है और प्रधानमंत्री योजना बनाकर उन्हें लाभ देने पर विचार कर रहे है क्योंकि मजदूर मजबूर है। सरकार उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाएंगी और बेचारा मजदूर क्या करेगा।

Monday, May 4, 2020

अतुलनीय, पूजनीय , प्रेरणास्त्रोत है प्रकृति

कोरोना के कहर के चलते दुनिया का बड़ा हिस्सा लाॅकडाॅउन है। जिसके चलते विषाणु उगलने वाले कारखाने बंद है। प्रकृति को हानि पहुंचाने और प्रकृति की गतिविधियों में हस्तक्षेप करने वाली इंसानी गतिविधियों पर रोक लगी हुई है। दुनिया के अलग - अलग हिस्सों में अलग - अलग अवधियों के लाॅकडाॅउन के चलते दुनियाभर में वायु , ध्वनि व जल प्रदूषण में कमी आई है। इसका प्रमाण स्वयं प्रकृति दे रहीं है। देष के सबसे प्रदूषित रहने वाले षहरो ंमें प्रदूषण का मानक स्तर संतोषजनक है। दुनिया भर की बड़ी नदियों का पानी स्वतः स्वच्छ हो गया है। नदियों व समुद्र के अंदर रहने वाले जीवों की दुनियां भी प्रसिद्ध फोटोग्राफर के कैमरे में कैद हो रहीं है। वहां की अदभुद दुनिया अब उपर से भी साफ नजर आ रहीं है । देष की प्रसिद्ध महानदी गंगा को साफ करने के लिए अब तक तमाम सरकारें करोड़ों रूपए बहा चुकी है लेकिन बावजूद इसके गंगा स्वच्छ व निरमल नहीं हो पाई। जो करोड़ों रूपए नहीं कर सकें वह लाॅकडाॅउन ने कर दिया यानि इसका सीधा सा मतलब है कि इंसानी गतिविधियों पर रोक ने प्रकृति को स्वयं में रहने का समय दिया और प्रकृति की षक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में बड़ी नदियांे ने स्वयं को साफ कर लिया है। वायु प्रदूषण कम होने से आसमान साफ व स्वच्छ नजर आने लगा है। सिर्फ नदियां ही नहीं पषु, पक्षियांे और अनेक जीवों की हलचल भी तेज हो गई है। उन्हें भी अब आसमान अपना नजर आ रहा है। दुनिया में उनका भी हिस्सा है अब ये वे भी महसूस कर रहे है। मुंबई जैसे अतिव्यस्त षहर में पक्षियों की चहलकदमी के कई वीडियों वायरल हुए जिनमें उनकी खुषी साफ नजर आ रहीं है। यहीं नहीं हानिकारक धुएं की वायुमंडल में कमी होने के बाद ओजोन परत में दिखाई देने वाला छेद लुप्त हो गया है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। यह किरणे प्रकृति सहित मानव जीवन के लिए घातक होती है। वैज्ञानिकों के लिए यह बड़े षोध विषय था कि अेाजोन परत को कैसे रिकवर किया जाएं । सोचिए इतनी वृहद समस्या हानिकारक धुंआ नहीं होने से स्वतः हल हो गई। प्रकृति में आ रहे इस सकारात्मक परिवर्तन पर विचार करना आवष्यक है। स्वयं पर आई विपत्ति को प्रकृति ने स्वतः हल कर लिया इसी से आप प्रकृति के षक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसलिए आवष्यक है कि हम प्रकृति पर बिना वजह अत्याचार करना बंद करें । प्रकृति निःस्वार्थ भाव से मनुष्य को अपना सर्वस्व अर्पण कर देती है। तो हमारा भी तो प्रकृति के प्रति कुछ कत्र्तव्य बनता है। हमें संभलना होगा प्रकृति पर व्यर्थ छिनने के बजाएं जितना आवष्यक हो उतना लें और उतना उसे देने का कत्र्तव्य भी निभाएं।

गरीबी सबसे बड़ा दुर्भाग्य

कोरोना काल में सबसे अधिक मार गरीब तबके पर पड़ रहीं है। चैतरफा परेषानियों से घिरे इस तबके के उद्धार के लिए कोई प्रयास अब तक सफलतापूर्वक नहीं किए गए है। अपने काम में व्यस्त रहे मजदूरों के सिर पर उस वक्त असीम विपत्ति (असीम इसलिए क्योंकि विपत्तियों से तो उनका जन्म से ही नाता रहता है ) का पहाड़ टूट पड़ा जब जनता कफ्र्यू के बाद अचानक लाॅकडाॅउन लगा दिया गया। पहले से ही अव्यवस्थित जीवन जीने को मजबूर इस तबके पर कोरोना की मार अधिक जोर से पड़ी है। कुछ पैसा कमाने की आस इन्हे दूसरे राज्यों की ओर पलायन को मजबूर करती है। जिससे उन राज्यों में भी इनका जीवन छोटे से कमरे या झोपड़ पट्टियों में बीतता है। किसी का पूरा परिवार उनके साथ होता है तो कोई अकेला ही काम की तलाष में बाहर आ जाता है। ताकि परिवार के पास पैसे भेजकर कुछ मदद कर सकें। रोज कमाकर जो रोटी खाता है। उसे यह पता चले कि अब कल से वह सभी काम बंद कर दिए जा रहे है तो उनके अंदर चल रहे अंतरद्वंद को कोई नहीं रोक सकता । सोचिए! जो लोग किराए से रह रहे हो , सड़कों पर आश्रय लिए हो जिनके पास कल के खाने तक का इंतजाम नहीं हो ऐसे में एक लंबे समय तक काम बंदी का फैसला सनने के बाद उनके अंदर कितनी उथल - पुथल मची होगी । जाहिर है इन हालातों में वे अपने जन्म स्थान अपने गांव लौट जाने को आतुर होंगे ही लेकिन दूर - दूर तक कोई साधन नजर नहीं आ रहे हो। ऐसे में यदि किसी तरह सरकार उन्हें आष्वस्त कर भी दे तो कितने दिनों तक उन्हें रोका जा सकता है। लाॅकडाॅउन को एक माह से अधिक हो चुका है लेकिन अभी भी प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है। इससे साफ होता है कि सरकार अपनी सेवाओं से उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रही ंहै। सरकार ही नहीं विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाएं भी जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने के काम मंे जुटी हुई है। बावजूद इसके सभी जरूरतमंदों तक मदद नहीं पहुंच पा रहीं है। जिनके परिवार उनके साथ है उनका तो समय कट जाएगा लेकिन जिनका परिवार साथ नहीं उनकी स्थिति बहुत खराब है। इसलिए वे पैदल या साइकिल से कई - कई किलोमीटर की यात्राएं करने को मजबूर हो गए। पैदल जाते हुए जिन लोगों की जान गई उनके परिवार की जवाबदारी कौन लेगा और यदि सरकार ऐलान कर भी दे तो क्या वाकई उन तक सभी जरूरते समय रहते पहुंच पाएंगी। अभी भी सरकार ने जरूरतमंदों के लिए अतिरिक्त अनाज के वितरण की व्यवस्था की थी लेकिन वह सुविधा राषन कार्ड धारकों तक ही पहुंची । अन्य जरूरतमंद इससे वंचित ही रहे इसीलिए तो उन्होंने हजारों किलोमीटर की दूरी बिना साधन के तय करने में भी परहेज नहीं किया और फिर वे करते भी क्या ? आज जिस तरह सरकारें कोटा में पढ़ाई कर रहे अपने छात्रों को बुलाने का बीड़ा उठा रहीं है । वैसी जहमत किसी ने प्रवासी मजदूरों को उनके गांव तक पहुंचाने के लिए नहीं उठाई। इसलिए उनके मासूम बच्चों को भूख से किलपना पड़ा, गर्भवती महिलाओं को उसी स्थिति में पैदल मिलों चलना पड़ा, किषोरों को भूखे - प्यासे चलना पड़ा। इन विपरीत हालातों ने कईयों की जान ले ली कितना दुखद है। इनकी स्थितियों को देख आंखे भर आती है और मन कहता है हे भगवान गरीबी किसी के भाग्य में मत देना। पहले से ही अभावों में रह रहे गरीबों पर दूसरी विपत्तियां जीवन का संकट बनकर आती है। रोटी की तलाष में यदि यह मजदूर बाहर जाते है तो पुलिस के डंडे खाने पड़ते है। ऐसी ही कई कहानियां हैै इसी तरह रोटी की तलाष में बाहर निकले मजदूर का पुलिस की पिटाई से पैर टूट गया। पुलिस ने उसे लावारिस छोड़ दिया । अन्य लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाया इलाज कराया। पुलिस इस दौर में अपनी ड्यटी ईमानदारी से निभा रहीं है लेकिन इस तरह किसी के हाथ - पैर तोड़ देना उचित नहीं है। पहले उनकी मजबूरी को समझे और उनकी मदद का इंतजाम करें । वहीं जो वाकई बिना वजह बाहर घूम रहे है उन पर कार्रवाही करें। इसके लिए सभी उनका सम्मान कर रहे है, लेकिन किसी गरीब मजदूर को उसकी मजबूरी समझे बिना मारना, अनुचित है। कोरोना का संकट कुछ समय का नहीं बल्कि लंबे समय तक रहने वाला है। जानकारी के मुताबिक इस एक माह के लाॅकडाॅउन से करीब 10 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए है। अभी भी हालात सामान्य होने में काफी वक्त लगेगा उससे साफ जाहिर है कि बेरोजगारों और गरीबों का आंकड़ा और अधिक बढ़ेगा। कोरोना के इस कहर ने असंगठित वर्ग की रीढ़ को तोड़ दिया है। आम गरीब होने के चलते इस वर्ग की आह का षायद किसी को अहसास नहीं है। लेकिन यहीं वर्ग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। इसी वर्ग के बिखरने का प्रभाव कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था पर दिखाई अवष्य देगा। इस वर्ग को असहाय छोड़ने के बजाएं योजनाबद्ध रूप से यदि काम किया जाता तो वैष्विक महामारी से जूझते देष में इन्हें अलग - थलग नहीं होना पड़ता।

Friday, April 24, 2020

पैदल गांव जा रहीं 12 साल की बच्ची की मौत

लॉकडॉउन के बाद से ही प्रवासी मजदूरों का अपने गांव जाने का सिलसिला जारी है। ऐसे ही अपने गांव को पैदल निकले मजदूर के साथ उसका परिवार था। लगातार तीन दिन तक पैदल चलने से 12 वर्षीय बच्ची की तबीयत बिगड़ गई जिससे उस मासूम की मौत हो गई। इसी तरह कई और मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी है। बीमारी से ज्यादा भूख से जूझ रहे इन मजदूरों को फिलहाल अपने गांव के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा क्योंकि कई मजदूरों के रहने तक का ठिकाना नहीं हो पा रहा है। किसी को एक वक्त का भोजना बमुष्किल मिल पा रहा है तो किसी के परिजन गांव में भूख से तड़पने को मजबूर है। ऐसे में उनकी चिंता भी इन मजदूरों को खाई जा रहीं है। अपना घर चलाने के लिए ही ये मजदूर अपना घर छोड़कर कमाने की तलाष में दूसरे राज्यों में आएं अब काम बंद है तो गांव तक पैसा भी नहीं पहुंचा पा रहे है। ऐसे में वहां पर उनके परिजन भूखे है और यदि दूसरे राज्य में इनकी कोई मदद कर भोजन दे भी रहा है तो कितने दिन अपने परिजनों की भूख की तड़प बर्दाष्त करेंगे। अपनी समस्याएं बताते हुए कई मजदूरों की आंखों में आंसू आ जाते है। किसी के बीवी बच्चे व बूढ़ी मां अकेली है तो किसी की पत्नी नहीं है बच्चे अकेले है। ऐसे मजदूर पर क्या गुजर रहीं होगी। सरकार इनके लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाती जिस तरह सरकारे कोटा में पढ़ रहे अपने छात्रों को वापस बुलाने के लिए बसें भेज रहीं है। उसी तरह क्या इन प्रवासी मजदूरों को भी उनके गांव वापस नहीं पहुंचाया जा सकता। या सरकार सिर्फ पैसे वालों की ही सुनती है और उनके ही बच्चे बच्चे है। आम मजदूर का परिवार नहीं उसके बच्चे नहीं होते क्या ? इस महामारी ने एक बात का अहसास करा दिया है कि गरीब होना किसी श्राप से कम नहीं है। बेचारा गरीब तिल - तिल मर रहा है, लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। बेचारे मजदूर यदि दो पैसे कमाने दूसरे राज्य को आएं तो उन्हें सरकारे उनके राज्य नहीं भेज सकती लेकिन कोटा में पढ़ रहे देषभर के बच्चों को सरकारे अपने खर्च पर अपने वाहन से वापस लाने का प्रयत्न कर रहीं है। महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने एक घोषणा की थी जिसके तहत चीनी मिलों में काम करने वाले लाखों मजदूरों को टेस्ट कराने के बाद वापस उनके गांव भेजने का प्रबंध किया जाएंगा। हालांकि इन सभी का टेस्ट होने और रिपोर्ट आने में वक्त लगेगा लेकिन कम से कम कोई उपाय तो किया । इसी तरह अन्य सरकारों को भी अपने यहां रह रहे उन मजदूरों को उनके परिजनों के पास भेजने का प्रबंध करना चाहिए नही ंतो उन्हें और उनके परिवार के खाने का प्रबंध करना चाहिए। यहीं प्रवासी मजदूर देष की रीड़ है मजदूरों के बिना कोई काम संभव नहीं है महामारी के इस गंभीर हालात में सरकार को इनके लिए अधिक से अधिक सहयोग करना होगा ताकि इनकी जिंदगी भी बची रहे।

कोरोना से मृत डॉक्टर के षव पर पत्थरबाजी अमानवीय, असंवेदनषील ,षर्मनाक

देषभर में कोरोना की जंग में अग्रिम पंक्ति में खड़े हमारे कोरोना यौद्धाओं पर जिस तरह से अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। यह समाज के उस भद्दी तस्वीर को दिखा रहीं है जो पूरे देष कोष्षर्मषार कर रहीं है। अब तक डॉक्टरों पर तलवार, पत्थरों से हमले की घटनाएं तो हमारे सामने आई लेकिन अब उनके मृत षरीर पर भी इंसानियत के दुष्मन पत्थर बरसा रहे है। मंगलवार को चैन्नई के डॉक्टर की कोरोना के चलते मौत के बात जिस एंबुलेंस में अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था । उस पर कई लोगों ने पत्थरों से हमला किया । इस हमले में डॉक्टर के परिजनों को बमुष्किल बचाया गया। आखिर लोगों को क्या हो गया है जो लोग अपनी जान पर खेलकर आपकों जिंदगी दे रहे है उन्हें भगवान की तरह पूजने उनकी रक्षा करने के बजाएं हम उन्हीं के भक्षक बनें हुए है। ऐसा करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाना चाहिए। वहीं सफाईकर्मी पर एक दबंग ने मंुह में सेनेटाइजर भर दिया दरअसल एक सफाईकर्मी गांव में सेनेटाइजेषन के लिए गया था ऐसे में कुछ बूंदे उस दबंग पर आ गिरी इससे वह इतना गुस्सा हुआ कि उसने सफाईकर्मी के मुंह मे सेनेटाइजर भर दिया जिससे उसकी मौत हो गई। महामारी के इस दौर में अपनी व अपने परिवार की परवाह किएं बिना देष सेवा में लगे इन यौद्धाओं के साथ समाज का ऐसा दुर्रव्यवहार किसी भी रूप में सहन करने योग्य नहीं है। यहीं नहीं सेवाएं देते हुए यह लोग खुद इस बीमारी की जद में आ रहे है । यहीं नहीं डॉक्टर पुलिसकर्मी अपनी जान भी गंवा चुके है। अब उनके परिवार का क्या होगा क्या कभी सोचा है ? नहीं सोचा तो सोचिए कि इन यौद्धाओं को नुकसान पहुंचाकर ये असमाजिक तत्व अपने विनाष को आमंत्रण दे रहे है। ऐसे लोगो ं के नहीं रहने से देष को कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन इनकी वजह से यदि हमारे स्वास्थ्यकर्मी , पुलिसकर्मी व सफाईकर्मी को कुछ होता है तो देष को बहुत बड़ा नुकसान झेलना होगा । पुलिसकर्मियों व स्वास्थ्यकर्मियों की टीम के साथ जिस तरह का अमानवीय व असंवेदनषील व्यवहार हो रहा है वह किसी भी रूप में सहन करने योग्य नही ंहैै । इन सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा देनी होगी ताकि आगे ऐसी हरकत करने वालों के हाथ उठने से पहले दस बार सोचे। इन जड़ बुद्धि के लोगों को कौन समझाएं कि यदि इन यौद्धाओं का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम अपमान तो मत करों।

चावल की बंपर आवक से बनेगा सेनेटाइजर ना कि भूखे को भोजन

देश में चावल की फसल जरूरत का तीन गुना उपलब्ध हैयानि जितने चावल की आवश्यकता है उसका तीन गुना चावल खाद्य भंडार मेंरखा है। सरकार इस अत्यधिक चावल से सेनेटाइजर बनाने की योजना बना रहीं है। दरअसल कोविड - 19 के चलतेदेशभर में सेनेजाइजर की मांग बढ़ गई है। घर, बाहर, दफ्तर सभी जगह सेनेटाइजर की आवश्यकता है। जिसके चलते सेनेटाइजर की काला बाजारी भी शुरू हो गई थी । इसकी मांग को देखते हुए सरकार ने चावल से सेनेटाइजर बनाने को मंजूरी देने की बात कह रहीं है। हालांकि यहां बुनियादी सवाल यह हैकि जहां लाखों लोगों को भोजन नसीब नहीं हो रहा है ऐसे हालातों में चावल का इस तरह दुरूपयोग करना कहा तक उचित है। सोचने वाली बात है कि हमने ऐसी कई तस्वीरे देखी जिनमें लाखों गरीबों के पास भोजन नहीं पहुंच रहा है। किसी के पास एक वक्त का भोजन पहुंच रहा है तो किसी कोपेटभर खाना नहीं मिल पा रहा है। कई मजदूरों के परिवार वाले भूखमरी की कगार पर पहुंच गए है। वहीं कई जगहों पर ऐसे हालात है कि मजदूर सुबह छह बजे से भोजन की लाइन में लग रहे है ताकि 12 बजे भोजन खुलने पर उनका नंबर जल्दी आ जाएं। 10 से 12 घंटे के इंतजार के बाद उन्हें एक वक्त का भोजन नसीब हो रहा है ऐसे हालातों में इन लोगों तक दोनों वक्त का भोजन पहुंचाने के बजाएं सरकार सेनेटाइजर बनाने पर विचार कर रहीं है। शर्म की बात है कि जिस देश में गरीब के पास खाने को नहीं है महामारी के ऐसे हालातों में भी सरकार को उस वर्ग की चिंता है जो सेनेटाइजर का उपयोग करती है ना कि उन गरीबों की जिन्हें एक वक्त का भरपेट भोजन तक नहीं मिल रहा और किसी - किसी को तो कई - कई दिनों तक भूखा रहना पड़ रहा है। हमने मजदूरों के पलायन की भयावह तस्वीर देखी है जिनमें हजारों किलोमीटर की यात्रा के लिए यह बेसहारा मजदूर पैदल ही निकल पड़े थे। इनमें से कितने अपने गंतव्य तक पहुंचे होंगे। बिना खाएं पिएं आखिर बेचारे कैसे अपनी मंजिल तक आसानी से पहुंच सकते है। वहीं अभी भी कई राज्यों में प्रवासी मजदूर फंसे हुए है। बीच - बीच मेंवे सड़कों पर आकर अपनी उपस्थिति का अहसास करा रहे है। पेट की आग तो बूझाना पड़ेगा दूसरे राज्यों में जैसे - तैसे दिन कांट रहे इन मजूदरों के लिए भोजन की व्यवस्था कराने के बजाएं सरकार चावल का उपयोग सेनेटाइजर के लिए करने जा रहीं है। रिजर्व बैंक की प्रेस कांफ्रेस में कहा गया कि देश में अनाज के भंडार भरे हुए है अनाज पर्याप्त मात्रा में है तो उन मजदूरों को संतुष्ट किया गया कि आपको भूखा नहीं रखा जाएगा लेकिन इनमें से कई भूखे रह रहे है ऐसे में सरकार को इस बुनियादी सवाल पर विचार करना चाहिए ताकि चावल का उपयोग सेनेटाइजर की बजाएं भूखों को भोजन देने में किया जाएं।

क्या और तबाही लाएगा कोविड -19 ?

हाल ही में आएं विष्व स्वास्थ्य संगठन के बयान ने दुनिया को और डरा दिया है , जिसमें कोरोना के कहर के बढ़ने के आसार को लेकर चेताया गया है। दुनिया पहले से ही कोरोना से जंग लड़ रहीं है। अभी तक इस महामारी का कोई भी पुख्ता इलाज सामने नहीं आया है। भगवान भरोसे नई- नई विधाओं पर काम किया जा रहा है। दिल्ली में प्लाज्मा थैरेपी से कुछ बात बनती दिख रहीं हैै । हाल ही में एक मरीज को इससे फायदा हुआ जिसके बाद उसे वेंटिलेटर से हटा दिया गया है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान में रैपिड टेस्ट किट के परिणाम गलत आने के बाद टेस्टिंग के लिए इनका प्रयोग फिलहाल रोक दिया गया है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी की गई सूचना में यह कहा गया कि अब जो कोविड के केस सामने आ रहे है उनमें किसी प्रकार के लक्षण पीडि़त में उभर कर सामने नहीं आ पा रहे है। इस तरह के करीब 80 प्रतिषत मामले सामने आएं जिनमें पीडि़त को कोई परेषानी नहीं थी बावजूद इसके वह कोविड पॉजिटिव पाया गया। इस तरह के आंकड़े और डर पैदा कर रहे है आखिर इस वायरस की हद क्या है। जब कोरोना वायरस का प्रकोप षुरू हुआ था उस समय ऐसी बाते भी कहीं गई थी कि तापमान बढ़ने पर इसका असर षायद कम हो सकता है हालांकि इस बारे में कोई पुख्ता सबूत नहीं थे और ना ही है। लेकिन जिस तरह तापमान थोड़ा बढ़ा है इसके बाद इस वायरस के लक्षण भी बदल रहे है यानि अब यह साइलेंट होकर वार कर रहा है। सबकुछ पता होते हुए भी जब हम इस वायरस को पकड़ नहीं पा रहे थे तो अब जब यह साइलंेट वार करेगा तो सोचिए क्या हालात बनेंगे । वहीं विष्व स्वास्थ्य संगठन ने हालिया बयान भी डराने की ओर ही इषारा कर रहे है। तमाम परेषानियों से जूझते हुए संक्रमितों के बीच रह रहे हमारे स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों , पुलिसकर्मियों के लिए यह और परेषान करने वाली स्थिति है। परेषानियों का सिलसिला थमने के बजाएं षायद बढ़ने की ओर इषारा कर रहा है। इस वायरस के चलते कहीं न कहीं पानी के उपयोग की अधिकता बढ़ी है। बार - बार हाथ धोना वहीं अब डर के चलते हम बाजार से लाई गई सब्जियों को भी पहले से अधिक बार धोते है। हालांकि स्वास्थ्य के लिहाज से हाथों की सफाई पर जोर देना अच्छा ही है। लेकिन गर्मियों में जलसंकट की समस्या हमारे देष में नई नहीं है। देषभर से गर्मियों के दौरान आने वाली जलसंकट की कई कहानियां हमने देखी और सुनी है। जिसमें कई - कई कोस चलकर महिलाएं पीने के पानी की जुगत करती देखती है। पानी के लिए जंग जैसे हालात भी बनते हुए हमने देखे है। जमीन में पानी की कमी होने से बोर , हेंडपंप आदि सूखने लगते है। उन हालातों में जब कई लोगों को पीने का पानी तक नसीब नहीं होता ऐसे हालातों में सोचिए ! कि क्या कोरोना से लड़ाई और मुष्किल नहीं हो जाएंगी। इस वक्त ऐसा लग रहा है मानो भगवान दुनिया की परीक्षा पर परीक्षा लिए जा रहीं है, लेकिन परीक्षा की इस घड़ी में हम सभी को अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी । यदि हम अपने कर्त्तव्य पथ से नहीं डिगे और अपने कर्म ईमानदारी से करते रहे तो परीक्षा की यह घड़ी भी निकल जाएंगी और ईमानदारों पर प्रकृति भी मेहरबान होगी । विष्वास है। हम इस जंग से एकसाथ लड़कर जरूर जीतेंगे ।

Friday, April 3, 2020

डाॅक्टरों से बदसलूकी - '’ष’र्मनाक...... षर्मनाक ....षर्मनाक ....

कोरोना के कहर से दुनिया कराह रहीं है। इस समय दुनियाभर के लिए यदि कोई आषा की किरणें हैं तो वह डाॅक्टर और पैरामेडिकल स्टाॅफ ही है। दुनिया को उनका षुक्रगुजार होना चाहिए कि अपनी जान व अपने परिवार की फिक्र किए बिना यह लोग निःस्वार्थ भाव से कोरोना पीड़ितों की सेवा में जुटे हुए है। इनकी जितनी प्रषंसा की जाएं कम है ऐसे मुष्किल वक्त में हमें भी अपनी जिम्मेदारियों से भागना नहीं चाहिए। इस समय देष में 2 हजार से अधिक मरीज कोरोना पाॅजिटिव है। देष के सभी राज्यों में कोरोना से मरीजों के संक्रमित होने का सिलसिला जारी है। सभी स्थानों पर सरकारी अस्पतालों में डाॅक्टर संसाधनों के अभाव से जूझते हुए अपनी परवाह किए बिना सेवाएं दे रहे है। ऐसे माहौल में यदि उनके उपर पथराव करने व धूकने जैसी अमानवीय घटनाएं देखने को मिले तो खून खौल उठता है उन लोगों के खिलाफ जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे है। मध्यप्रदेष के सफाई में नंबर वन षहर इंदौर से डाॅक्टरों के खिलाफ दो षर्मनाक घटनाएं सामने आई है। जिनमें एक घटना टाट पट्टी बाखल इलाके की है जहां के अब्दुल हामीद की कोरोना से मौत हो जाने के बाद स्वास्थ्यकर्मी उनके परिजनों को ले जाने और उस क्षेत्र के लोगों की जांच करने आई थी । इस दौरान लोगों ने स्वास्थ्य कर्मियों पर पथराव कर दिया कई लोगों ने मिलकर उन पर हमला बोल दिया । एक स्वास्थ्यकर्मी के मुताबिक वे बमुष्किल वहां से बचकर निकल पाएं नही तो ये लोग इनकी जान ले लेते। वहीं दूसरी घटना इंदौर के ही रानीपुरा की है जहां स्वास्थ्यकर्मियों पर धूकने की घटना हुई थी। जो लोग आपको जिंदगी दे सकते है उनकी जान से यदि इस तरह से खिलवाड़ करना किसी भी रूप में उचित नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने इन दोनों मामलों में आरोपियों पर कार्यवाही करते हुए पहली घटना में आरोपियों पर रासुका और दूसरी घटना में संबंधितों पर एफआईआर दर्ज की गई है। वहीं यूपी के गाजियाबाद में तब्लीगी जमात के कोरोना पाॅजिटिव छह मरीजों ने नर्सो के साथ गलत व्यवहार किया। जानकारी के मुताबिक यहां इन मरीजों ने नर्सो के सामने कपड़े उतारे और अष्लील हरकते की। अगर इस तरह से यह मरीज उन लोगों के साथ बर्ताव करेंगे जो आपको जिंदगी दे रहे है तो यह कतई सहन नहीं किया जा सकता। आखिर ये स्वास्थ्य कर्मी दिन रात किसकी सेवा में लगे हुए है ऐसे में इनके साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार मानवीय गुण को नहीं दर्षाता । इस समय हर जिम्मेदार नागरिक का यहीं फर्ज बनता है कि डाॅक्टरों व स्टाॅफ का भरपूर सहयोग किया जाएं । एक तरफ कोरोना का कहर वहीं दूसरी ओर मरीजों के जानवर नुमा व्यवहार के बीच स्वास्थ्यकर्मियों की सेवाएं अनवरत जारी हैै । संसाधनों के अभाव में सेवाएं देे रहे डाॅक्टर कोरोना पाॅजिटिव मरीजों के बीच में दिन रात रह रहे हमारे डाॅक्टरों के पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं है। 30 मार्च को टाइम्स आॅफ इंडिया की खबर के मुताबिक कोलकाता में डाॅक्टरों को रेन कोट दे दिए गए। वहीं कई जगहों पर (पीपीई प्लास्टर प्रोटेक्षन ) की गुणवत्ता कहीं से भी संतोषजनक नहीं है। देष भर में करीब 3.5 लाख पीपीई है अब देषभर से इसकी कमी का षोर सामने आने लगा है। मध्यप्रदेष सरकार भी संसाधनों को जुटाने में प्रयासरत है लेकिन यहां भी संसाधनों की कमी साफ जाहिर है। प्रदेष भर में जहां 900 वेंटीलेटर है वहीं 7.5 करोड़ की आबादी में तमाम सरकारी व गैर सरकारी अस्पतालों को मिलाकर सिर्फ 1200 बस्तर है। करीब 16709 पीपीई है वहीं एन- 95 मास्क 74,380 है जबकि थ्री लेयर मास्क 5 लाख के आसपास है। यानि डाॅक्टर व पैरामेडिकल स्टाॅफ अपनी जान पर खेलकर लोगों की जान बचाने में जुटे हुए है। तमाम परेषानियों से जुझते हुए वे अपनी सेवाएं दे रहे है। यदि डाॅक्टरों की सेफ्टी नहीं होगी तो उनकी जान पर खतरा मंडराता रहेगा। इसी का परिणाम है कि देष में करीब 54 डाॅक्टर कोरोना पाॅजिटिव पाएं गए है। वहीं अकेले इटली में 50 से अधिक डाॅक्टरों की मौत हो चुकी है और 7 हजार से अधिक हेल्थ वर्कर संक्रमित है। इस समय हमें अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए डाॅक्टरों की मदद करना चाहिए। तब्लीगी जमात की जहालत निजामुद्दीन के मरकस में तब्लीगी जमात के लोगों ने जो कांड किया उसका खामियाजा पूरा देष भुगत रहा है। अभी भी ये लोग देष के अलग -अलग हिस्सों में जाकर छुपे हुए है । स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस काॅफ्रेंस में कहा गया कि तब्लीगी जमात से जुड़े लोगों के 48 राज्यों में होने की संभावना है । जमात के करीब 647 लोग कोरोना पाॅजिटिव पाएं गए है। इस मुष्किल घड़ी में तब्लीगी जमात ने जो कारनामा किया है उसका अंजाम पूरा देष भुगत रहा है विडंबना यह है कि इनके लोग इलाज में स्वास्थ्य कर्मियों की मदद भी नहीं कर रहे है। वहीं देष के अलग - अलग हिस्सों में अभी भी ये लोग छुपे हुए है। तमाम राज्यों के प्रषासन स्तर पर उन्हें खोजने का प्रयास जारी है । ऐसे में साफ जाहिर है कि लोग जानबूझकर खुद को छुपाकर दूसरों को भी संक्रमित करना चाहते है। ऐसा करके कहीं न कहीं यह देष द्रोही कहलाने का काम कर रहे हैै । यदि ये लोग सच्चे देष भक्त होते तो छुपने के बजाए खुद बाहर आकर अपना टेस्ट करवाते और इस मुष्किल घड़ी में डाॅक्टरों की मदद करते । पुलिसकर्मियों को बरगलाने के बजाएं खुद अपनी पहचान बताते और जो अन्य लोग मौजूद थे उनकी भी जानकारी देते । इन लोगों को पकड़ने के बाद इन पर आपराधिक केस दर्ज करना चाहिए इन्हें आसानी से नहीं छोड़ना चाहिए ताकि इन जैसों को कुछ तो सबक मिल सकें। अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों की आफत कोरोना से चल रहीं इस जंग के बीच वे मरीज आफत में आ गए है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ रहे है। कैंसर के इलाज के दौरान डाॅक्टर मरीज को लगातार आने की सलाह देते है इलाज को रोकना कैंसर के मरीज के लिए घातक साबित हो सकता है। ऐसे में जब बस , ट्रेन व प्लेन सभी आवागमन के साधन बंद है तो ऐसे में मरीजों का बाहर से आना संभव नहीं है। ऐसे में कैंसर के मरीज जहां है वहीं अपना इलाज करा सकते है। हालांकि आपातकालीन सेवाएं जारी है लेकिन ऐसे में कैंसर के अन्य मरीजों के लिए परेषानियां बढ़ती जा रहीं हैै क्योंकि उनकी कीमोथैरेपी में गैप करना रोग को बढ़ाने जैसा ही है। लेकिन कैंसर के मरीज का कोरोना के संपर्क में आना उनके लिए और घातक सिद्ध हो सकता है। ऐसे में उन मरीजों के डाॅक्टरों का फर्ज है कि उन्हें फोन के जरिए ही जितनी हो सके जानकारी दी जाएं और इस समय वे किस प्रकार अपने इलाज को आगे बढ़ाएं इसकी भी जानकारी देना चाहिए। हालांकि प्रत्येक कीमोथैरेपी से पहले मरीज के कई ब्लड टेस्ट होते है लेकिन इस माहौल में जितना संभव हो डाॅक्टरों को अपने इन मरीजों का भी ध्यान रखना होगा। ताली और दिए के बजाए संसाधनों दरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना के कर्मवीरों के लिए पहले ताली और अब दिया जलाकर हौसला अफजाई करने को कहा है। इसके बजाएं इस समय इन कर्मवीरों को संसाधनों की अधिक दरकार है। अपनी जान को दांव पर लगाकर ये दिन - रात कोरोना मरीजों को ठीक करने में जुटे हुए है। इस समय उनका हम रोज भी सम्मान में कुछ न कुछ करें तो कम होगा बजाएं इसके इस वक्त उन्हें जिन संसाधनों की दरकार है। सरकार से निवेदन है कि उस दिषा में तीव्र गति से काम करने की दरकार हैै ताकि डाॅक्टर्स व पैरामेडिकल स्टाफ अपनी पूरी सुरक्षा के साथ इन मरीजों के इलाज में जुटे । असुरक्षा के माहौल में डाॅक्टर्स खुद संक्रमित होते जा रहे है ऐसे में कहीं यदि अस्पतालों को डाॅक्टरों के लिए आइसोलेट करना पड़ जाएं तो आम मरीजों का इलाज कहा होगा । इस समस्या से बचने के लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द डाॅक्टरों को अच्छी गुणवत्ता के सुरक्षा कवज मुहैया कराएं जाएं ताकि वे सुरिक्षत होकर कोरोना के मरीजों को सुरक्षित रखने का काम करें।

Thursday, March 26, 2020

कोरोना से पहले भूख - प्यास से मरने की कगार पर बेघर

कोरोना के कहर के चलते हजारों दिहाड़ी मजदूरों की जान पर बन आई है। रोजी - रोटी की आस में महानगरों में रह रहे इन मजदूरों की जिंदगी संकट में आ गई है। वैष्विक महामारी कोरोना के कारण हुए देषव्यापी लाॅकडाॅउन से इनकी रोजी- रोटी छिन गई है। अब ये लोग 400 - 500 किलोमीटर की यात्रा पैदल करने पर मजबूर हो गए है। इनके छोटे - छोटे मासूम बच्चे कई दिनों से भुखे है। परिवार के साथ ये लोग अपने - अपने गांव की ओर पैदल ही निकल पड़े है। इनका कहना है कि सरकार हमारे लिए कुछ करें नही ंतो कोरोना से पहले हम भूख से मर जाएंगे। इनकी हालत को देखकर रोना आ रहा है। हमारे यहां कितनी असमानता है। जिन जगहों पर ये काम कर रहे थे किसी ने इनके बारे में नहीं सोचा कुछ ठेके पर काम करते थे कुछ अन्य संस्थानों में थे। सरकार राषन , सिलेंडर और खातों में पैसा डालने की बात कर रहीं है लेकिन न तो इनका कहीं खाता है। ऐसे में सरकार ने जो ऐलान किया है खातों में पैसा डालने का तो जिन लोगों के पास खाता नहीं है क्या उन्हें जीने का हक नहीं है । उनके लिए रहने खाने की व्यवस्था करना आखिर किसकी जिम्मेदारी है। सरकार ने लाॅकडाउन कर दिया लेकिन इनका और इनके परिवार की फिक्र कौन करेगा ? अगर इस तरह भूखे प्यासे के चलते रहे तो अपने गांव भी सही सलामत पहुंच पाएंगे या नहीं ? उन बच्चों के रोते हुए चेहरे और कई दिनों से भुखे होने की बात सुनकर मेरा दिल दहल गया। आंखों में पानी आ रहा है काष इनकी कोई मदद कर दे। इन्हें किसी तरह पानी और खाना नसीब हो जाएं । देषव्यापी लाॅकडाउन की घोषणा करने से पहले इन्हें सूचना दे दी जाती तो कम से कम ये लोग अपने गांव तो सहीं सलामत पहंुच जाते। गौरतलब है कि कोरोना कहर बनकर दुनियाभर पर टूटा है ऐसे में दुनिया के दूसरे देषों जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन , आस्टेªलिया आदि ने वहां के मजदूर वर्ग के लिए बकायदा आर्थिक मदद की पूरी व्यवस्था की है। हमारे यहां सरकारे घोषणाएं अवष्य कर रहीं है लेकिन पंजीकृत मजदूरो ं के लिए लेकिन जो पंजीकृत नहीं उनका क्या । इसकी एक बानगी एक रिसचर के आंकड़ों से साफ हो जाती है कि अकेले दिल्ली में दस लाख मजदूर कंस्ट्रक्षन में काम करते है जबकि मात्र 35 हजार मजदूर पंजीकृत किए गए है। ऐसे में अपंजीकृत मजदूरों के लिए कौन इस आफत की घड़ी में देवता बनकर आएगा। इनमें कछ तो ऐसे है जो मुंबई से नेपाल जाने के लिए निकले थे और दिल्ली में आकर फंस गए है। अब ये नेपाल किस तरह पहंुचेगे न तो पैसे है न कोई दूसरी व्यवस्था अब इनका क्या होगा ? किसी का छोटा बच्चा है जिसे दूध चाहिए लेकिन मां ने भी दो दिन से कुछ नहीं खाया है दूध नहीं आ रहा बच्चा भूख के मारे किलप रहा है। हे भगवान ऐसे लोगों की मदद के लिए जल्दी सरकार की आंखे खोलिए । जानते है कि कोरोना भयंकर बिमारी है लेकिन इन लोगों को इस तरह मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता इनके लिए सरकार को अपने स्तर पर कुछ व्यवस्था जल्दी करनी होगी उम्मीद की जा सकती है कि किसी गांव में इन्हें मदद मिल जाएं व रहने का ठिकाना मिल जाएं क्योंकि भूखे - प्यासे इतनी लंबी दूरी पैदल तय करना आसान नहीं होगा। ये लोग कुछ दिनों से पानी पी कर दिन कांट रहे है। वहीं जब टेंकर आता है तो भीड़ लग जाती है ऐेसे में टैंकर भी लौट जाते है बहरहाल इन्हें पीने का पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। कोरोेना का कहर इन पर दोहरी मार लेकर आया है क्योंकि इन्हें कोेरोना से ज्यादा भूख- प्यास से मरने का डर है। जनवरी में कोरोना का मामला भारत में सामने आ गया था ऐसे में तभी सरकार को सतर्क हो जाना था और मामले की नजाकत को समझते हुए इस बेघर आबादी को उनके घर भेज देना था ताकि ये समय रहते अपने गंतव्यों तक पहुंच जाते। हालांकि डब्ल्यूएचओ भारत के लाॅकडाउन की पहल की सराहना अवष्य की जा रही है लेकिन भारत में लोगों की आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लिए जाते तो बेघरों के मासूम बच्चों को भूख - प्यास से इस तरह तड़पना नहीं पड़ता। हालांकि कई स्वयंसेवी संस्थाएं , पुलिस वाले , अन्य संस्थाएं भूूखों को भोजन दे रहे है लेकिन बावजूद इसके एक बड़ी आबादी तक भोजन नहीं पहंुच रहा है। इसलिए ये आबादी पैदल ही अपने गांवों के लिए निकल पड़े है। आखिर क्या करें ये लोग इनके पास और कोई रास्ता भी नहीं है। चंद लोगों की लापरवाहीं ने पूरी दुनिया व देष को संक्रमण के खतरे में डाल दिया है। गौरतलब है कि यह संक्रमण चीन से फैला था यानि विदेषों से यह संक्रमण फैलते - फैलते भारत तक पहंुचा है। भारतीय ने इसे जन्म नहीं दिया है । एक गरीब और आम आदमी तो विदेष नहीं जाता है। समृद्ध परिवार व उनके बच्चे ही विदेष में जाते है या तो घूमने या पढ़ने ऐसे लोगों को यदि उसी वक्त बंद कर दिया जाता तो षायद इन मजदूरांे को इस तरह के हालात से नहीं गुजरना पड़ता। हालांकि एयरपोर्ट पर विदेषों से आएं लोगों से षपथ प़त्र भरवाया गया था कि आप घर में जाकर 14 दिन तक अलग रहेंगे लेकिन लोगों ने इसका पालन नहीं किया इसे गंभीरता से नहीं लिया ये कोई अनपढ़ लोग नहीं थे पढ़े लिखे थे और विदेषों से आएं थे लेकिन इन लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया परिवार से मिले लोगों से मिले और कोरोना का संक्रमण अपनों सहित दूसरों में फैला दिया। अब यह संक्रमण चाहे अनचाहे अन्य लोगों में फैल रहा है। हालांकि सरकार ने लाॅक डाॅउन घोषित किया है इसे सही समय पर करने की बात भी की जा रही है लेकिन यदि यह थोड़ा पहले इन दिहाड़ी मजदूरों की सुध ले लेती तो इनके मासूमों को इस तरह भूख - प्यास के लिए किलपना नहीं पड़ता। अब ऐेसे वक्त में सरकार को इनकी कुछ तो मदद करना ही चाहिए ताकि ये किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं सही सलामत।

Wednesday, October 31, 2018

यात्राओं और परिक्रमाओं से साफ नहीं होगी मां नर्मदा

विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट तेज होने लगी है। पक्ष व विपक्ष के बीच बयानबाजी में आरोप - प्रत्यारोपों का दौर जारी है। चुनावी सभाएं शुरू हो चुकी है लेकिन इन सभाओं में छोछले मुद्दे ही गर्माएं रहते है। अहम मुद्दों की ओर कोई भी राजनेता जनता का ध्यान खींचना नहीं चाहता है। हां संवेदनशील मुद्दों पर अपनी राजनीति चमकाने का अवसर कोई नहीं खोना चाहता। ऐसे ही मुद्दों में नर्मदा संरक्षण व सफाई का मुद्दा है। नर्मदा संरक्षण के नेता मंच से वादे तो बड़े- बड़े करते है और नर्मदा किनारें कई राजनीतिक यात्राएं भी हुई लेकिन नर्मदा की भलाई के लिए सार्थक पहल दूर- दूर तक नजर नहीं आती । नर्मदा अपने प्राक्टय स्थल से लेकर हर स्थान पर प्रदूषित होती जा रही है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा मासिक रिपोर्ट में नर्मदा नदी के जल को ‘‘बी‘‘ केटेगिरी में शामिल किया है यानि जल प्रदूषण की श्रेणी है। प्रदेश की जीवदायिनी कही जाने वाली मां नर्मदा नदी को स्वच्छ बनाने को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिसंबर 2016 से लेकर मई 2017 तक छह माह लंबी नर्मदा सेवा यात्रा कर लोगों का ध्यान नर्मदा की ओर खींचा जरूर था लेकिन इस यात्रा पर सरकार ने जितना पैसा पानी की तरह बहाया उतना नर्मदा के उत्थान में लगाया होता तो वाकई नर्मदे हर सार्थक हो चुका होता। विधानसभा में सरकार ने माना की यात्रा पर 40 करोड़ रूपए खर्च हुए, लेकिन सूत्रों की माने तो प्रचार पर करीब 100 करोड़ खर्च किए। सीएम की यात्रा का कोई आउटपुट डेढ़ साल बाद भी नजर नहीं आ रहा है। नर्मदा के लिए न तो कोई योजना बनी है और ना ही वर्तमान योजनाओं पर युद्ध स्तर से कार्य हो रहा है। नर्मदा में जगह- जगह पर नालों का पानी मिल रहा है वहीं कई फैक्टीयों का प्रदूषित कचरा सहित कई तरह के मानव प्रदूषण द्वारा नदी पर अत्याचार जारी है। नर्मदा में हो रहे प्रदूषण के कई प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कारण है। इनमें हर एक कारण का जड़ से निदान करना अब बहुत जरूरी हो गया है। समय हाथ से फिसलता जा रहा है अगर अभी भी हम नहीं संभले तो नर्मदा के अस्तित्व पर खतरा और गहराता जाएंगा। मानव निर्मित प्रदूषण पर तो पूरी तरह रोक लग जानी चाहिए । हम नर्मदा को मां की तरह पूजते है इसीलिए तो उसमें स्नान कर हम अपने को पवित्र करने की कोशिश करते है। यूं तो बारह महिने मां नर्मदा में स्नान करने श्रद ्धालु पहुंचते है वहीं माह की खास तिथियों पर श्रद्धालुओं का बेजा हुजूम उमड़ता है लेकिन ये सारी भीड़ पवित्र नदी में मात्र स्नान के लिए नहीं आती बल्कि कई तरह का प्रदूषण फैलाकर चली जाती है। इस तरह हमारी पूजा तो पूरी तरह अपवित्र हो गई और हमारा स्नान - ध्यान भी व्यर्थ गया। हमने - आपने सैकड़ों बार ऐसे दृश्य देखे होंगे जिनमें लोग साबुन लगाकर स्नान कर रहे है, साबुन से कपड़े धो रहे है , अपने वाहनों को धो रहे है, स्नान के बाद पूजन सामग्री के रेपर वहीं छोड़ देते है और हवनादि सामग्री को नदी में ही विसर्जित करते है इसी तरह के ढ़ेरो कृत्य हम नर्मदा के साथ कर रहे है। नर्मदा हमारे लिए मां स्वरूप व जीवनदायिनी है और हम इस तरह के कृत्यों से मां की पूजा के बजाएं उनका अपमान कर रहे है । मां के भक्त नंगे पैर मां नर्मदा की परिक्रमा करते है यहीं नहीं कई श्रद्धालु तो षष्टांग प्रणाम करते हुए पैदल यात्रा करते है । इतनी श्रद्घा भक्ति के बाद यदि हम मां का इस तरह से अपमान करेंगे तो सारी पूजा व्यर्थ है। हमें स्वयं इस बात को समझना होगा और जितना हम से बन पड़े मां नर्मदा की सफाई में योगदान देना होगा यही मां के प्रति हमारी सच्ची भक्ति होगी कोसों तक पैदल चलकर मां के दर्शन कर यदि हम मां को थोड़ा सा भी प्रदूषित करते है तो इतनी लंबी पैदल यात्रा का कोई महत्व नहीं है इसके बजाए आप मां के किनारों की सफाई करें, नदी से कुछ दूर पौधारोपण करें और श्रद्धा का स्थल होने के नाते मां नर्मदा में घंटो समय बिताने के बजाए नदी में मात्र डुबकी लगाकर बाहर आने की प्रथा का सभी को पालन करना होगा तभी हम अपनी जीवनदायिनी मां नर्मदा को स्वच्छ व सुरक्षित रखने में थोड़ा सा योगदान दे पाएंगे। पहले हम अपने स्तर मां नर्मदा को साफ रखने का प्रयत्न करें उसके बाद दूसरों से साफ रखने की अपील करें। सरकार को भी परिक्रमाएं व यात्राएं करने के बजाए जमीनी स्तर पर ऐसी ठोस योजना बनानी होगी ताकि नर्मदा में मिलने वाले प्रदूषित पानी को रोका जा सके । वहीं नदी में हो रहे अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगाना होगा क्योकि रेत पानी को साफ बनाए रखने में अहम योगदान देती है । नदी में से बेपनाह रेत निकालकर अभी तक हम मां नर्मदा का सीना छलनी कर चुके है सिर्फ अपने लाभ के लिए हमने नर्मदा का उपयोग किया है नर्मदा की भलाई के लिए अभी तक उस स्तर पर प्रयास नहीं हो रहे है जिसकी वर्तमान में दरकार है। अवैध रेत खनन करने वाले माफियाओं को किसी का भय नहीं है खुले आम अवैध खनन करते है और अपनी रंगदारी भी बताते है । ऐसे कई मामले अभी तक सामने आ चुके है जिनमे यह देखा गया है कि यदि किसी पुलिस वाले ने अवैध माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाई है तो उनकी आवाज को दबा दिया गया है। ऐसे में सरकार की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है । सरकार को ऐसे माफियाओं के खिलाफ सख्त होना होगा ताकि नर्मदा का सीना छलनी होने से बच सकें। हमने अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए नर्मदा को प्रदूषित किया है बावजूद इसके मां नर्मदा ने अपनी ओर से हमें देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है ऐसे में हमारा यह कत्तवर्य बनता है कि मां नर्मदा कि भलाई के लिए हम अपने स्तर पर छोटे से छोटा ही सही प्रयास जारी रखे क्योंकि बूंद-बूंद से गागर भरता है।

Wednesday, January 10, 2018

दर्दनाक हादसे लेकिन बेपरवाह जिम्मेदार

वर्ष की शुरूआत भयानक सड़क हादसों से हुई है, जिनमें मासूमों को जान गंवानी पड़ी है। 6 जनवरी शनिवार को इंदौर के दिल्ली पब्लिक स्कूल की बस का भयानक एक्सीडेंट हुआ, जिसमें चार मासूम बच्चों की मृत्यु को गई। इस दर्दनाक हादसे ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली बदहवास परिजन अपने बच्चों के लिए बिलख रहे है। वहीं दूसरी ओर यह यक्ष प्रश्न हम सभी के सामने खड़ा है कि क्या हालात सुधरेंगे क्योंकि सभी के बच्चे वेन और स्कूल बसों से स्कूल काॅलेज जाते है। इतने बड़े हादसों के बाद भी मात्र जिम्मेदारी तय करने जैसे दिखावा होता है। जब तक मामला मीडिया में सुर्खियों में रहता है बस तभी तक उस पर बहस व बात होती है। उसके बाद कोई झांकने वाला नहीं होता है। इस मामले में भी गलती कई स्तरों पर हुईहै जिसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पडा है। बस की फिटनेस को लेकर जहां स्कूल प्रबंधन ने लापरवाही की वहीं आरटीओकी भी भयानक गलतियां सामने आ रही है क्योंकि जब गाड़ियों को फिटनेस सर्टिफिकेट दिया जाता है तो नियम पूर्वक कार्रवाही नहीं होती मात्र कागजी खानपूर्ति कर सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है और सभी बेफिक्र हो जाते है और बसे व वैन धड़ल्ले से बेपरवाह दौड़ती रहती है। जब कोई ऐसा दर्दनाक हादसा हो जाता है तब सुधार की बात की जाती है तो मेरा यहां यही सवाल है कि जब परिजन इतनी मोटी फीस देकर बच्चों को बड़े स्कूलों में भेज रहे तो बच्चे की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की होनी चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। स्कूल प्रबंधन पैसा तो हर चीज का वसूलते है लेकिन उस स्तर की सुविधाएं क्यो मुहैया नहीं कराते है। उनकी यह लापरवाही अभिभावकों पर भारी पड रही है उनकी गलती ने माता-पिता से उनके आंख के तारों को छीन लिया है जिसे कोई दोबारा उन्हें नहीं दे पाएंगा। स्कूल के खिलाफ भलेही कोई भी कार्रवाही हो जाएं लेकिन उससे न तो स्कूल बंद होगा न स्कूल की कमाई पर कोई फर्क पड़ेगा जिनका सब छिन न था छिन चुका । अब कोई भी कार्रवाही उन अभिभावकों को उनकी खुशियां नहीं लौटा सकती, लेकिन हां यहां अभी की सर्तकता आगे ऐसे हादसे होने से रोक सकती है। इस मामले में चैतरफा गलतियां उजागर हुई है और सुधार भी उसी स्तर का हो तभी उसका सकारात्मक असर नजर आएंगा। सड़क पर अनाड़ी भी गाड़ियां दौडा रहे है और कंडम गाड़िया भी दौड़ रही है। इस हादसे के पहले भोपाल के बैरागढ़ में एक दर्दनाक सड़क हादसा हुआ था, जिसमें एक नौसिखियां कार चालक ने स्कूल की बस का इंतजार कर रही दो मासूम छात्राओं पर गाड़ी चढ़ा दी थी, जिसमें एक की मौत हो गई थी और दूसरी घायल हो गई थी। इस मामले में भी आरटीओ की गलती सामने आई थी कि एक वह व्यक्ति कार चलाना सीख रहा था, जबकि उसके पास पहले से ही डाइविंग लाइसेंस था। इस तरह के व्यक्तियों को कैसे डाइविंग लाइसेंस जारी किया जा सकता है उस व्यक्ति की गलती ने एक मासूम की जिंदगी छीन ली। इसका मतलब लाइसंेस की उपयोगिता ही खत्म हो गई जिसे वाहन चलाना नहीं आता उसके पास लाइसेंस है और कई बिना लाइसेंस के ही वाहन धड़ल्ले से दौड़ा रहे है। लाइसेंसे की प्रक्रिया में बिचैलियों व पैसा लेकर लाइसेंस बनाने के कई मामले सामने आ चुके है । कई हादसे हो चुके है, लेकिन बावजूद इसके न तो प्रशासन न ही सरकार के कान पर जूं रेंग रही है। ऐसे में उन परिवारों के दुखों के लिए कौन जिम्मेदार होगा जिनके चिंरागों को इन सड़क हारसों ने छीन लिया ? बेलगाम व्यवस्था पर लगाम लगाना होगा ताकि अब ऐसे दर्दनाक हादसे न झेलेना पड़े। श्रद्धा अग्निहोत्री

Friday, September 22, 2017

शक्ति को रौंदने वालों को हक नहीं मां की भक्ति का

शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि आरंभ हो चुकी है। नौदिनों तक मां दुर्गा की विधि - विधान से पूजा अर्चना की जाएगी। जगह -जगह पांडाल व झांकियां सजेगी, गरबा व डांडिया रास होंगे, कन्याभोज व भंडारे का आयोजन किया जाएगा। नौदिनों तक उल्लास का माहौल रहेगा। हम हर वर्ष मां आदिशक्ति की उपासना में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतेलेकिन कहीं न कहीं हम उपरी आडंबर यह भूल जाते हैकि नवरात्रि आंतरिक उपासना का भी पर्व है। हमारे देश में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना पूरी आस्था सेकी जाती है लेकिन आज भी शक्ति का ही स्वरूप महिलाएंअपने वजूद को तलाश रही है। मां के ही स्वरूप में आने वाली नन्हीं कलियों को बेरहमी से आज भी हमारे समाज में रौंदने वालों की कमी नहीं है। मासूम बच्चियोंसे लेकर सशक्त नारी तक कोई सुरक्षित नही ंहै। अब पापों का घड़ा भर चुका है क्योंकि पिता ही बेटी की अस्मत लूट रहे है। हमारे समाज में महिलाएं बेझिझक, निडर होकर आज भी नहीं जा पाती हैमहिला सुरक्षा जैसेगंभीर मुद्दे पर कोई कारगर कदम नहीं उठा पाया है। भ्रूण हत्याएं जारी है, नवजात बच्चियां मृत मिल रही है। आज भी समाज में बेटों की चाह कायम है यहीं नहीं पुरूषों के अलावा महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन है क्योंकि आज भी उनके मन में लड़का - लड़की का भेद याथावत हैऔर लड़का ही वंशवृद्धि का ध्योतक है। यूं तो बडे से बड़ा गुनहगार भी मां का भक्त हो सकता है लेकिन मेरी नजर में लड़कियों को हिकारत से देखने वाले, नवजात बच्चियों को कचरे केढेर में फेंक कर उन पर पत्थर रखने वालों को हक नहीं है कि वे मां की आराधना करे, किसी मासूम बच्ची या महिला को बुरी नजर से देखने वाले को हक नही ंहै कि वह मां की मूर्ति की आंखों में आंखे डालकर देखे, किसी दुष्कर्मी को हक नहीं है कि वह मां के पांडाल केसमीप तक जाएं, कोख में की बेटी को मारने वाले को मां की उपासना का हक नहीं दिया जा सकता। इसी तरह चलोंअब एक लड़का और हो जाएं तो अच्छा ऐसे कहने वालो कोभी एक बार अपने अंदर से इस भेद को मिटाकर ही मां के आगे शीश नवाना चाहिए ।

Tuesday, March 26, 2013

देश की नींव को कमजोर कर रहा गठबंधन


देश में कुकुरमु̣ो की तरह उग आई क्षेत्रीय पार् ियों ने देश को खोखला कर दिया है। राष्ट्रीय पार् ी की बां और गद्दी की भूख ने देश में धीरे-धीरे छो ी-छो ी पार् ियों को जन्म दिया, जो आगे चलकर जोह रहा हमारे देश की राजनीति धेग̀डो पर चल रही है। विचारों की असमानता उन राज्यों की बागडोर संभालने लगी। समय गुजरता गया और देश के हालात भी बदलते गए राष्ट्रीय छवि के नेताओं के साथ राष्ट्रीय पार् ियों का दौर भी खत्म हो गया। अब देश की सरकार यहां वहां से थेग̀डा लगा कर चल रही है। जब किसी की मांग पूरी नहीं होती तो वह अपना हाथ खींच लेता है और सरकार की नैय्या डगमगाने लगती है। इसी से राजनीतिक अस्थिरता के दौर का उदय होता है। आज हमारा देश राजनीतिक अस्थिरता से ही गुजर रहा है। कई क्षेत्रीय पार् ियों के सहयोग से चल रही सरकार पर आए दिन संक अपना दबदबा बनाए रखना चाहती है और जब उसे अपना उल्लू सीधा होता नहीं दिखता तो वह सरकार से हाथ खींच लेती है। इस तरह सरकार छो ी-छो ी पार् ियों के रहमोकरम पर चलती रहती है। देश में आज क्षेत्रीयता इस तेजी से हावी हुई है कि वर्तमान में एक देश एक पार् ी का सपना तो सपने में भी नहीं देखा जा सकता। गठबंधन की राजनीति ने राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी है। सरकार को विपक्ष के साथ-साथ अपने घ क दलों का विरोध भी झेलना प̀डता है। गठबंधन की शुरूआत और परिणाम सबसे पहले १९६२ में गठबंधन की राजनीति की शुरूआत हुई थी। उसके बाद कांग्रेस ने एक क्षत्र राज किया। फिर १९९६ में अ ल जी के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी और तब से यह सिलसिला अनवरत जारी है। राज्यों में क्षेत्रीय पार् ियों की पैठ के बाद राष्ट्रीय पार् ी अपनी भूमिका ठीक ढंग से नहीं निभा पाई उसी का परिणाम हम आज तक झेल रहे हैं। गठबंधन से देश को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ है। पहली बात तो गठबंधन में पार् ियों के बीच हर मुद्दे पर आम सहमति बन पाना उतना आसान नहीं होता। इसमें समय और उर्जा दोनों की ज्यादा खपत होती है हर पार् ी पहले अपने हित साधने की कोशिश करती है और बाद में पूरे गठबंधन के हित के बारे में सोचा जाता है। इसके चलते देश के विकास पर ध्यान कम और आपसी मतभेद को सुलझाने में समय ज्यादा खर्च होता है। वैसे मतभेद तो एक पार् ी के कार्यकर्ताओं में भी हो सकते है, लेकिन उन्हें सुलझाने में व̣ाâ कम जाया होता है और शीघ्र उसका हल निकाल लिया जाता है। लेकिन पार् ियां भिन्न होेने पर बात को लंबा खींचा जाता है और हर हाल में अपने पक्ष को मजबूत करने का प्रयास किया जाता है। जब मिली जुली सरकार होती है तो कभी भी आफत आ सकती है। पिछले दिनों यूपीए-२ से ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था। पहले उन्हीें के कहने पर सरकार ने रेल मंत्री बदला और बाद में उन्हीं ने साथ छो̀ड दिया। यानि कुलमिलाकर हर ओर अस्थिरता रहती है मंत्रियों को मंत्रालय सौंपने से लेकर कोई भी पैâसला करने में प्रमुखों पर तलवार ल कती रहती है। आज है कल नहीं के बीच पेंडुलम की तरह ल कती सरकार किसी भी के बादल छाए रहते है। क्योंकि हर पार् ी अपने राज्य में लिहाज से देश के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

Tuesday, January 8, 2013

हैवानों के हौसलों को पस्त करने के लिए, वक्त अब कानून में बदलाव का है

हैवानों के हौसलों को पस्त करने के लिए, वक्त अब कानून में बदलाव का है दिल्ली में 16 दिसंबर को हुई दिल दहला देने वाली घटना के बाद एक ओर जहां आवाम में रोष व्याप्त है वहीं दूसरी और राजनीतिज्ञों व धर्म गुरू आसाराम बापू के बेतुके बयानों से समाज षर्मसार है। वहीं हाल ही में चष्मदीद के बयान ने सभी को हिला दिया है उसने पुलिस के रर्वैए पर भी सवालिया निषान लगा दिया है। इस घटना ने हर किसी को झकझौर कर रख दिया है। यू ंतो हमारे देष में रोजाना कहीं न कहीं महिलाओं से अत्याचार व दुराचार होता ही रहता है, लेकिन इस घटना ने समाज के सजग वर्ग को तो जगा दिया है। लेकिन क्या सिर्फ विरोध प्रदर्षन से रेप जैसे गंभीर अपराधों पर रोक लग सकेगी । वर्तमान में चैतरफा विरोध होने के बाद भी महिलाओं से होने वाली छेडछाड और रेप की घटनाएं लगातार जारी है। जब तक अपराध करने वालों के दिल में दहषत नहीं जागेगी तब तक ऐसे अपराधों में कमी आने का प्रष्न ही नहीं उठता। इस जघन्य अपराध के बाद भी देष के जनप्रतिनिधियों ने जिस तरह के बयान दिए है उससे तो साफ जाहिर होता है कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद ही करना होगा क्योंकि अब तक जितने भी बयान आए है सभी कहीं न कहीं महिलाओं को भी जिम्मेदार मान रहे है। ऐसे संवेदनषील मामलों पर भी राजनेता राजनीति करने से बाज नहीं आते है। आज समाज में महिलाओं की सुरक्षा बहुत बडा प्रष्न है हर कोई गिदद की तरह महिलाओं पर नजर जमा कर बैठा है। यदि इस समस्या की जड पर विचार किया जाए तो हम पाएंगे कि आज 10 -12 साल की उम्र में बच्चे वो समझ विकसित हो गई है जिसके बारे में 10 साल पहले हम सोच भी नहीं सकते थे। जिस तेजी से आधुनिक सुविधाएं बढी है और समाज की तस्वीर बदली है। व्याभिचार सबसे अधिक पनप रहा है और जब तक बचपन से ही बच्चों के दिल में महिलाओं के प्रति बेहतर सोच विकसित नहीं होगी तब तक व्याभिचाररहित समाज का निर्माण संभव नहीं है। लोगों की गंदी सोच को किस तरह परिवर्तित किया जाए इसके लिए बस एक ही निदान है कि दंड को इतना कठोर कर दिया जाए कि कोई भी अपराध करने से पहले उसके अंजाम से ही सिहर उठे । महिला की अस्मिता कोई मामूली बात नहीं है । आज देष के हर कौने से हमें महिलाओं के लिए सिर्फ इसी तरह की बातें सुनने को मिल रही है तो क्या जब जिसका मन करेगा वह महिला की इज्जत को तार-तार करके चलता बनेगा और उसे सजा मिलने में इतना समय लगेगा तब तक उसका विष्वास और आस ही टूट चुकी होगी । खैर अब सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से जुडे मामलों पर षीघ्र फैसला लेने की बात कहीं है। देष की बेटी ने अपना बलिदान देकर लोगों को जगा तो दिया है, लेकिन इस आंदोलन की आग को दूसरे आंदोलनों की तरह बुझने नहीं देना है क्योंकि यह कोई छोटा मामला नहीं है। अपराध बहुत बरसों से होता आ रहा है, लेकिन सजा में अब कोई न कोई परिवर्तन करने का समय आ गया है। इस तरह के हैवानियत भरे कर्म के बाद निर्मम हत्या करने वालों को षीघ्र सजा होनी चाहिए। वहीं रेप करने वाले नाबालिको के मामले में भी अब कठोर निर्णय लेने का वक्त आ गया है। जब नाबालिक होते हुए किसी महिला की अस्मिता से खेल सकते है तो फिर सजा देेते समय उसे नाबालिक मानना क्या उचित है। अपराध की गंभीरता को देखते हुए नाबालिकों के मामले में भी उम्र को कम करने पर विचार करना होगा और उन नाबालिकों की अक्ल भी ठिकाने लगानी होगी। बरसों पुरानी जंजीरों को तोडकर बमुष्किल महिलाओं ने चैके के साथ-साथ बाहर निकलने का निर्णय लिया था, लेकिन समाज के चंद हैवानों ने उनकी राहों को और मुष्किल कर दिया है। रेप जैसे जघन्य अपराध के बढते मामलों से कहीं महिलाओं के हौसले सिथिल न पड जाएं। आज भी महिलाओं की सफलता सभी के गले नहीं उतरती और देखा गया है कि घर सहित बाहर भी उन्हें दबाने की भरसक कोषिष की जाती है, लेकिन यदि महिलाएं सफल होती है तो अपने आत्मविष्वास और अपनों के सहयोग के बल पर । महिलाओं की उपस्थिति के बिना आखिर यह समाज है ही क्या और इसका अस्तित्व ही क्या है। इतनी बडी सच्चाई से वाकिफ होने के बाद भी महिलाओं को कुचलने का कोई भी मौका हैवान नहीं छोडते है। अब वक्त आ गया है कि सरकार ऐसे सषक्त सिस्टम को तैयार करे जो महिलाओं को भरपूर सुरक्षा दे और महिलाओं पर होने वाले अपराधों के खिलाफ डट कर खडे रहे। वहीं राजनेताओं को बडबोले बयान छोडकर एक बेहतर कानून को बनाने की पहल करना चाहिए ताकि अंजाम देखकर ही अपराधियों के हौसले पस्त हो जाए। आध्यात्म भी हमें ऐसे मामलों से कैसा निपटा जाए इसका बेहतर रास्ता दिखाते है। यहां षिवमहापुराण के उस अध्याय का जिक्र करना जरूरी है, जिसमें ़ऋषि गौतम ने इंद्रदेव को अहिल्यादेवी से छल करने पर पुरूष्त्वहीन होने का श्राप दिया था। आध्यात्मिक किताबों से सीख लेकर भी हम सजा को कठोर कर सकते है। बढते व्याभिचार को रोकने के लिए महिलाओं को आत्मरक्षा के गुर भी सीखने चाहिए ताकि आवष्यकता पडने पर वह अपनी मदद खुद भी कर सकें । समाज को इतना सजग होना होगा कि ऐसे मामलों में कोई चुप न बैठे और आवाज उठाएं ताकि आरोपियों के हौसले पस्त हो जाए । महिला की रूह तक को छलनी कर देने वाली इन घटनाओं पर अंकुष लगाने के लिए चैतरफा पहल की जरूरत र्है और राजनेताओं को भी इस मामले में नैतिकता का प्रमाण देना चाहिए यह नहीं कि बेतुका बयान देकर पल्ला झाड लें आखिर जनता ने उन्हें उनका जनप्रतिनिधि बनाकर बिठाया है तो उनकी सुरक्षा का फर्ज उनकी भी बनता है। वक्त आ गया है बदलाव का ........

Monday, November 1, 2010

मौते हुई................... मगर इलाज का जरिया वहीं

बहुत पुराना डाक्टर है और रात - बेरात कहां जाएं दिखाने यहां नहीं तो और कहां दिखाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी नहीं बच पाई......... दो- तीन दिन से सिर में दर्द था तो यहीं के डाक्टर को दिखाया। बाटल इंजेक्शन लगाने के बाद भी ठीक नहीं हुई। अगले दिन डाक्टर ने कह दिया बाहर ले जाओ । पिपरिया के एक प्राइवेट अस्पताल के दरवाजे पर ही दम तोड़ दिया ।
पति तो पहले ही चल बसा था अब ये भी चली गई इस बच्चे के सिर से तो दोनों का साया उठ गया। यह कहानी हैं बसंती बाई की, जो होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील से सटे ग्राम खैरीकलां की रहवासी थी । गांव वालों ने बताया कि जब की कोई अचानक कोई बीमार होता है तो यहीं के डाक्टर को दिखाते हैं।
इन्हीं की पडोसी रामरति को भी ठीक ऐसी ही परेशानी हुई। रामरति के परिवार वालों ने बताया कि एक-दो दिन से सिर में दर्द था एक दिन यहां दिखाने के बाद आराम नहीं मिला तो पिपरिया के सरकारी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टर ने बताया कि तीन डंडी वाला बुखार है फिर बाटल और दवांईया दी । अस्पताल में एक दिन रूकने के बाद घर आ गए मगर उसे अभी भी आराम नहीं है। बहुत कमजोर हो गई है और चक्कर आते रहते है।
दोनों गौड आदिवासी महिलाएं थी जिन्हें असल में मलेरिया हो गया था, लेकिन समय पर ठीक इलाज नहीं हो पाने के कारण एक की मौत हो गई और दूसरी की तबीयत काफी बिगड गई। सरकार झोला छाप डाक्टरों को खत्म करने की बात करती है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि परेशानी में यही डाक्टर उन लोगों के काम आते हैं। यह भी सही है कि इलाज के नाम पर वह बीमार व्यक्ति पर दवांईयां आजमाते है क्योंकि सही बीमारी का पता तो उन्हें नहीं रहता और इसी में कई बार व्यक्ति अपनी जान गंवा देते हैं या दूसरी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हमारे आसपास होंगे जिनमें इन डाक्टरों की वजह से परेशानी खड़ी हुई है। ग्राम खैरीकलां से लगे तरौन ग्राम में भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि एक दिन काम करते हुए एक मजदूर का हाथ मशीन में आ गया और तुरंत गांव के डाक्टर को दिखाया तो उसने पता नहीं कौन सी दवांई दी जिससे उसके पूरे शरीर में खुजली मचने लगी और लाल दाने उभर आएं मुंह के अंदर तक लाल दाने हो गए थे। फिर उसे पिपरिया सीएचसी में दिखाया उसके काफी दिनों बाद उसे आराम लगा। कुछ कहते हैं कि डाक्टर तो काफी पुराने है, अब हमारी तो मजबूरी है एनटाइम पर इन्हें ही दिखाना पडता है।
ऐसे हालात में झोला छाप को खत्म करने के लिए गांव में डाक्टरों की नियुक्ति करना होगा, जो उनके बस की बात नहीं है। एक एएनएम तो रहने को तैयार कर नहीं पा रहे हैं फिर डाक्टर की नियुक्ति करना बहुत टेढी खीर है। एक मजदूर के घर जब कोई बीमार पडता है तो उसका असर पूरे परिवार पर पडता है क्योंकि इलाज के लिए पैसा चाहिए और वहीं तो नहीं होता उनके पास । सभी मजदूरों के हालात एक जैसे हैं यदि किसी का इलाज कराना है तो दूसरे से पैसा उधार लेकर ही करवाना होता है।
रामरति के ससुर कहते हैं कि हम तो ठहरे मजदूर आदमी रोज करते है और परिवार को खिलाते हैं। ऐसी स्थिति होने पर पैसा उधार ही लेना पडता है क्योंकि इतना पैसा हमारे पास नहीं होता । बहु बीमार हुई तो करीब 5 हजार का खर्चा हो गया अब धीरे-धीरे चुकाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद यदि व्यक्ति बच जाएं तो ठीक नहीं तो ................ । अब जो महिला खत्म हो गई उनका भी करीब इतना ही खर्चा हुआ होगा, खर्चा भी हुआ और वह भी नहीं बची । ‘‘लकडी/फाटा का काम करते हैं काम नहीं रहता तो जे बैठे हैं।‘‘
इस घटना के बाद जनपद अध्यक्ष का जवाब था कि झोलाछाप डाक्टरों पर रोक लगाना होगा, लेकिन क्या इनके अलावा गांवों में और कोई साधन हैं । हां एक ओर साधन हैं जिन्हें ओझा कहते है? जहां तक सुप्रशिक्षित डाक्टरों का सवाल है तो गांव में कोई भी आना पसंद नहीं करते। सबसेंटर भी महीने में एक बार खुलते हैं, जब टीकाकरण होना होता है। उस दिन भी सिर्फ एएनएम ही आती है।
जहां तक आंगनबाडी या आशा कार्यकर्ता की बात है तो दोनों के पास भी पर्याप्त दवांईयां नहीं होती। ऐसे में गांव वालों के पास विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ एक ही सहारा रहता है। जिन्हें बंगाली या झोलाछाप डाक्टरों के नाम से जाना जाता है।
पिपरिया से सटी तहसील सोहागपुर के गांवों में बरसात के दौरान मलेरिया फैल रहा था तो कुछ गांवों में स्वास्थ्य टीम भेजी गई उन्होंने औपचारिकता के तौर पर लोगों का इलाज खून की जांच किए बिना ही कर दिया और कुछ गांवों में तो टीम ही नहीं गई। वहां के दलित संगठन से जुड़े डा. आवटे ने बताया कि मरीजों ने जब यह बताया तो उनके खून की जांच करवाई गई तो लगभग सभी में मलेरिया पाॅजीटिव पाया गया ।
आज के वैज्ञानिक युग में भी उल्टी, दस्त और बुखार से मौत होना शायद सरकार के लिए मायने नहीं रखता होगा, लेकिन यह कोई छोटी घटनाएं नहीं है। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए जो समिति बनाई है वे भी इन मुददों पर बात करना जरूरी नहीं समझते। जब इन विषयों पर गांव के सरपंच, पंच, आंगनबाडी और आशा कार्यकर्ता से बात करते हैं तो सभी के अपने-अपने तर्क होते हैं। कोई कहता है कि पीडित पक्ष की गलती है उन्होंने समय रहते नहीं दिखाया तो कोई कहता है कि झाडा फंूकी में लगे रहे इसी का परिणाम है। किसी के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं क्योंकि वे भी डाक्टर तो नहीं है ऐसे समय में व्यक्ति की मदद डाक्टर ही कर सकता है। जब वहीं समय पर उपलब्ध नहीं है तो कोई कुछ नहीं कर सकता, लेकिन ऐसी घटनाओं के बाद भी किसी प्रकार के परिवर्तन की गुंजाईश नजर नहीं आती।
हाल ही में सरकार ने डाक्टरों को अधिक वेतन देकर गांवों में काम करने का प्रलोभन भी दिया, लेकिन यह कदम कितना कारगर होगा देखते है ? इससे तो बेहतर है कि सरकार उन बंगाली डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण देकर प्राथमिक इलाज करने के योग्य बना दे । जब एक आंठवी पास आशा या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को सरकार ने इतना अधिकार दिया है कि वे दंवाईयां दे सकें । तो कुछ ऐसे डाक्टर हैं जिनके पास लाईसेंस है तो कम से कम उन्हें विधिवत ट्रेनिंग दी जा सकती हैं।

Wednesday, September 29, 2010

रोटी की जुगत

श्रद्धा मंडलोई
बीमारों का इलाज और दो जून रोटी की जुगत में कट रही जिंदगी
दुनिया मंे हम आए हैं तो जीना ही पडेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पडेगा...... मदर इंडिया का यह गीत सुनते ही संघर्षरत नरगिस का चेहरा हमारे सामने उभर आता है। फिल्म में नरगिस का किरदार हर मुश्किलों से लडते हुए अपने परिवार का पेट पालती है। इस फिल्म ने कई रिकार्ड तोडे और नरगिस की अलग छवि उभर कर सामने आई, लेकिन हमारे आसपास भी ऐसी कई मदर इंडिया है जिन्हें हम नहीं देख पा रहे है । आइए आपकी पहचान कुछ ऐसी ही मदर इंडिया से करवाते है जो घर के साथ बाहर की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही है।
सुशीला बाई लकडियों का गटठा बांधने में व्यस्त कल की रोजी रोटी की तैयारी कर रही है। मंगलदास बाहर आंगन में रखे बिस्तर पर लेटे हुए है। जैसे ही मैंने घर में प्रवेश किया तो मंगलदास उठने की कोशिश करने लगे और सुशीला बाई ने रस्सी बांधते हुए मुडकर देखा और बोली काय कौन है। फिर मेरी तरफ मुडते हुए बोली का बात है। धीरे - धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सुशीला बाई बताती है कि परिवार में कमाने वाली और बनाने वाली मैं ही हूं। छोटा बेटा और बहू दोनों टीबी के मरीज है और पति असहाय हो गए है। पैसों के अभाव में पति का इलाज भी नहीं हो पा रहा है । बेटे के इलाज के लिए थोडे बहुत रकम थी वह गिरवी रख दी। बीमारियों ने मुझे बहुत तोड दिया है। मजूरी करके या जंगल से लकडी बीनकर बेचती हूं जितना मिल जाएं उसी में कर खा रहे है। का करे जिंदगी तो कांटना पडेगा। सुशीला बाई खुद 60 बरस की है लेकिन परिवार की खातिर इस उम्र में भी दोनों जिम्मेदारिया बखूबी निभा रही है। वे बताती है कि लकडियों के गटठे के कभी किसी ने गरीब समझकर 50 रूपए दे दिए तो खूब हो जाता है नही तो 20-30 रूपए मंे ही घर चलाना पडता है। रोज खाने को मिले ऐसा जरूरी नहीं हैं। झोपडी नुमा घर तीन टुकडों में बंटा हुआ है एक तरफ बडा और दूसरी तरफ छोटा बेटा रहता है, लेकिन छोटे बेटे और पत्नी को जब से टीबी हुई है मां ही बनाकर खिला रही है। राशन कार्ड पर जितना राशन मिल रहा है बस उसी पर निर्भर है। राशन में भी सिर्फ 20 किलो गेंहू और 2 किलो शक्कर मिल रही है। पांच लोगों में वह कब तक पूरा पडेगा। झोपडी की मरम्मत के लिए इंदिरा आवास के तहत पंचायत से सात हजार रूपए का चैक मिला है, लेकिन चैक टूट ही नहीं रहा है उसे लेकर इधर - उधर घूम रहे हैं। सुशीला बाई से जब कहा कि आपने गांव की समीति से इस बारे में कोई बात की तो उन्होंने कहा कि कौन सी समीति। यानि ग्रामीणों को यह नहीं पता कि यदि उनके स्वास्थ्य सेे जुडी कोई समस्या है तो उसे ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समीति के साथ बांट सकते हैं। सुशीला बाई ने कहा कि इलाज में मेरे जितने गहने थे वे भी बिक गए और अब हाथ में कुछ नहीं है। ऐसे हालात में समीति उनकी सहायता कर उन्हें दीनदयाल अंतोदय योजना या अन्य योजना का लाभ दिला सकती थी। लेकिन समीति की भूमिका यहां भी लचर ही रही।
यह तो शुरूआत है पिपरिया से करीब 10 किलोमीटर दूर ग्राम रिछैडा में ऐसी कई महिलाएं है जो परिवार का पालन कर रही है। गांव की आशा हेमलता दुबे 36 वर्ष के पति कैलाश दुबे विकलांग है। हेमलता ने बताया कि शादी के दस साल बाद गले की नस चिपट जाने से विकलांग हो गए थे। तब से घर की जिम्मेदारी मेरे उपर आ गई। हेमलता के तीन बच्चे है पति की हालत दिन-ब-दिन गिरती जा रही है। लंबे समय तक इलाज कराने के बाद भी कोई अंतर नहीं पडा। नागपुर के सीम्स अस्पताल में भी दिखाया लेकिन कुछ अंतर नहीं आया । हेमलता ने बताया कि डाक्टर का कहना है कि आपरेशन में रिस्क है और जरूरी नहीं की इनकी जान बच पाए । डाक्टर के ऐसा कहने के बाद घर वालों की राय ली तो सभी ने कहा कि वे अभी दिख तो रहे है तुम तो घर आ जाओ तो घर ले आए । अब पैसा भी इतना नहीं है कि रोज दवा करा सके । टीकाकरण और जितने केस मिल जाएं उसी पर परिवार चल रहा है। पति बिल्कुल असहाय हो गए है वे बिस्तर पर ही रहते है। नहलाने से लेकर शौच सहित सभी काम बिस्तर पर ही होते है। दिन ब दिन उनकी हालत गिरती जा रही है।
पैतीस वर्षीय मुन्नीबाई के पति का एक साल पहले निधन हो गया उनके पांच बच्चे है। मुन्नीबाई मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पाल रही है। बच्चों को पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलने के कारण बच्चे कमजोर भी है। पचास वर्षीय गौरा नागवंशी अपनी मां और भतीजी के साथ रहती है और रोज मजदूरी करके घर चला रही है। गौरा बाई बताती है कि यदि यहां की बाईयां काम न करें तो आदमी भूखे मर जाएंगे । गौरा की मां बीमार है वे गिर गई थी तब से चलने में बहुत परेशानी है। उनसे कुछ करते नहीं बनता। पैसा नहीं होने के कारण उनका इलाज भी नहीं हो पा रहा है। सरकारी अस्पताल में दिखाया था मगर आराम नहीं लगा । पचपन वर्षीय घसीटी बाई भी अपने दम पर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है।
गावं में अधेड उम्र की महिलाएं हर समस्या का डट कर सामना कर रही है। जितनी भी महिलाएं अपने दम पर घर चला रही है उनके परिवार में कोई न कोई बडी बीमारी से ग्रस्त है। मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाली महिलाओं को बाहर से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल पा रही है। इस उम्र मंे भी जैसे बन रहा है वैसे अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही है। ये कामकाजी महिलाएं बताती है कि कभी -कभी तो जिंदगी बहुत बोझ लगने लगती है लेकिन फिर घर वालों का मुंह देखकर जीना पडता है। ऐसा लगता कि कि आखिर क्या करें कि रोज रोटी और घरवालों का इलाज दोनों काम अच्छे से चलते रहे, लेकिन पढे - लिखे नहीं होने के कारण कोई दूसरा काम भी नहीं मिलता है। फिर जैसा काम मिलता है करना पडता है। सुुशीला बाई कहती है कि बस रोज यही सोच कर घर से निकलती हूं कि इतना मिल जाएं कि घर वालों को भूखा न सोना पडे। कभी - कभी तो ऐसा होता है कि कंटोल की दुकान से राशन लेने के लिए भी पैसा नहीं होता है।

Monday, September 6, 2010

कम उम्र में बडे बोझ के भार से दब जाती हैं बेटियां

चार साल की उम्र में उसके सिर पर घडा रखने की जिम्मेदारी आ जाती है। छह साल की होते ही अपने छोटे भाई - बहनों और चूल्हा-चोका संभालने की जिम्मेदारी और इसके दो साल बाद उसकी पढाई छूट जाती है । वह बच्ची की उम्र में आधी मां बन जाती है। बालिक होने के पहले ही उसने आधी जिंदगी जी ली है। कुछ ही समय बाद माता - पिता के लिए बेटी सयानी हो जाएगी और अब उसकी डोली उठने की तैयारी होने लगती है। 15 - 16 साल की होते होते उसका ब्याह हो जाता है। शादी के कुछ ही समय बाद वह पूरी मां बन जाती है और साथ ही दूसरे घर के पूरे सदस्यों की जिम्मेदारी भी उस पर आ जाती है। अब वह बच्चों की जिम्मेदारी संभालने के साथ बाहर का काम भी करती है। इतनी बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालने वाली को ही आखिर हमारे समाज में बोझ क्यों समझा जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है भारतीय महिलाओं की, जो बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालते-संभालते उम्र से पहले ही बडी हो जाती है। सभी का ख्याल रखते-रखते वह अपना ख्याल रखना भूल जाती है। बस इन्हीं कारणों से देश की महिलाएं कमजोर होती है और उनमें एनीमिया, हिमोग्लोबिन कम होता है। यहीं लडकी जब मां बनती है तो कमजोर होने के कारण बच्चों में कुपोषण होता है और शिशु मृत्यु और मातृत्व मृत्यु के लिए भी कहीं न कहीं यहीं जीवन शैली जिम्मेदार है। देश की महिलाओं और बच्चों में होने वाली समस्यों का सबसे बडा कारण गरीबी और दूसरा कारण महिलाओं को कम उम्र में सौपी जाने वाली जिम्मेदारियां है।
जहां एक ओर महिलाएं अंतरिक्ष में कदम रख रही है और हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है वहीं गांवों में आज भी महिलाएं लंबा घूंघट लेती है और 15 साल की उम्र में बच्चों की मां बन चुकी होती है। चाहे मघ्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के ग्राम पचुआ ,रिछैडा हो या छिंदवाडा जिले के बोरीमाल और कोकट लगभग सभी ग्रामों की यही कहानी है। वर्तमान में भारत में करीब 56 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार हंै। इसका सबसे बडा कारण गांव की लडकियों का अपनी उम्र से पहले ही बडी होना माना जा सकता है।
गांव में अब भी महिलाएं पुरूषों के सामने पर्दे में ही रहती है और घर के बडों की उपस्थिति में नहीं बोलती। पहुंच मार्ग से अंदर के गांवों में हालात बहुत ही गंभीर है यहां महिलाएं न तो अपनी उम्र ठीक से जानती है और अन्य जरूरी बातों से भी अंजान है। यहां उन्हें समझाने वाला भी कोई नहीं है। कई गांवों में आंगनबाडी कार्यकर्ता दूसरे ग्रामों से आती है इसलिए वह उन्हें पर्याप्त समय नहीं दे पाती और कुछ स्थानों पर सहायिका बहुत ही कम पढी-लिखी है उन्हें स्वयं कई बातों का ज्ञान नहीं है। महिलाओं को गर्भवस्था के दौरान कई बातों का ध्यान रखना होता है। घर के बढे तो उन्हें समझाते है लेकिन मेडिकल की दृष्टि से भी कई बाते जरूरी होती है, जो उन्हें जानना जरूरी है, लेकिन कोई उन्हें सही सलाह देने वाला नहीं है। जहां तक माॅनीटरिंग का सवाल है तो पहुंच मार्ग से दूर बसे गांव में साल में एक या दो बार ही निरीक्षण होता है। जहां तक ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समीति की बात करें तो अभी कई ग्रामों में यह समिति नहीं बनीं है। जहां बनी है वहां समीति के सदस्यों को ही पता नहीं है कि वे समीति का हिस्सा है तो अपनी जिम्मेदारी निभाना तो दूर की बात है। समिति की सदस्य एवं सचिव आशा कार्यकर्ता होती है उनकी भी अपनी कई समस्याएं हैं जैसे कुछ क्षेत्रों की महिलाएं आसानी से बातों को नहीं समझती ऐसा ही उदाहरण होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड के ग्राम रिछैडा में सामने आया। रिछैडा आदिवासी बहुल क्षे़त्र है और जंगल से लगा हुआ है। वहां की आशा कार्यकर्ता ने बताया कि टीका लगवाने से लेकर परिवार नियोजन सभी के लिए महिलाओं को समझाना बहुत टेढी खीर है। कई बार यदि महिलाएं मान जाएं तो उनके पति और घर के बडो को समझाना मुश्किल हो जाता है। कई सयानी महिलाएं कहती है कि हमें इतने बच्चे हो गए हमें तो कोई टीके नहीं लगे और सब बच्चे चंगे भले जन गए , जो तो बस ढकोसला है। यानि महिलाओं के निर्णय वे खुद नहीं लेती या तो उनके पति लेते है या उनके बडे - बुजुर्ग। महिला घर के हर सदस्य का पूरा ख्याल रखती है, लेकिन उसकी जरूरत और उसका ख्याल रखने वाला कोई नहीं होता है। उसके निर्णय में भी सभी का राजी होना जरूरी होता है।
आशा कार्यकर्ता कहती है कि महिलाओं को समझाने के लिए उनका शिक्षित होना बहुत जरूरी है, लेकिन जहां तक पढाई का सवाल है तो लडकियों को पढाने की अपेक्षा घर का काम कराना ज्यादा महत्वपूर्ण समझा जाता है। इसीलिए सपना कह बैठती है किं चाहती तो मैं भी हूं पढना पर छोटे भाईयों को कौन संभालेगा मां तो बनहारी पर जाती है मासूम सपना अपनी मासूमीयत में इतनी बडी बात कह बैठती है जो हमारे गांवों की सच्चाई को बयां करती है। सपना जैसी ही न जाने कितनी लडकियां हमारे गांवों में अपनी कई इच्छाओं को दबाएं अपना जीवन कांट रही है। इनमें से कई तो इसी को अपना जीवन मान चुकी है। इन लडकियों के नाम स्कूल में दर्ज होेते है , लेकिन मां के बनहारी पर जाने के कारण वह चाहकर भी स्कूल नहीं जा पाती। वहीं यह भी देखा गया कि जब लडकी समझदार हो जाती है तो उसकी पढाई खुद -ब -खुद छूट जाती है। पैदा होते ही उसकी जिम्मेदारियां अपने आप ही तय हो जाती है लडका और लडकी के बीच आज भी जमीन - आसमान का अंतर है। पानी भरने से लेकर घर का हर काम सिर्फ वहीं करेगी क्योंकि वह लडकी हैै। जंगल से महुआ, गुल्ली और अचार इत्यादि बीनना उसी का काम है। विभिन्न ग्रामों के टीकाकरण कार्यक्रम के दौरान कई तरह की सच्चाई सामने आई। 15 साल की राजाबाई जो पहली बार मां बनने जा रही है टीका लगवाने पहुंची तो बहुत घबरा रही थी। उससे जब पूछा कि इतनी कम उम्र में तुम्हारी शादी हो गई तुम्हे कैसा लगता है तो उसका जवाब था हमारे यहां ऐसा ही होता है। गांव में संपन्न परिवार के बच्चे ही पढने जाते है मजदूर वर्ग व अतिगरीब परिवार के बच्चे तो थोडा बहुत पढकर पढाई छोड देते है। जैसे ही लडकी कुछ बडी लगने लगती है उसकी शादी की बात शुरू कर दी जाती है और कब वह बच्चों की मां बन जाती है उसे भी पता नहीं चलता। गांव में सब कुछ अंदाजे से किया जाता है। गांव में आज भी जमकर बाल विवाह हो रहे है। जब मुख्यमंत्री द्वारा चलाए जा रहे कन्यादान योजना में नाबालिक लडकियों की शादी के मामला उभर कर सामने आए तो गांव की वास्तविकता क्या होगी इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
होशंगाबाद और छिंदवाडा के गांवों मंे भ्रमण करने पर वहां की महिलाओं को बहुत करीब से जानने का मौका मिला। गांव की महिलाएं दुनियादारी से बहुत दूर है। बचपन से ही बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालने के कारण वे अपने स्वाथ्य का ख्याल नहीं रख पाती है और इसी का नतीजा है कि हमारा देश महिलाओं और बच्चों से संबंधित बीमारियों में अव्वल है। बचपन से ही उम्र के मुताबिक पोषण आहार नहीं मिलने के कारण और स्वास्थ्य का ख्याल नहीं रखपाने के कारण बच्चों में कुपोषण और महिलाएं एनीमिया और हिमोग्लोबिन की कमी का दंश झेल रही है । लडकियों की उम्र से पहले शादी हो जाने और गर्भवति होने पर कई तरह की समस्याएं से दो-चार होना आम बात हैै। इसी के कारण मातृत्व और शिशु मृत्यु दर को लक्ष्य में खास कमी नहीं आ पा रही है। सामान्य दिन हो या गर्भवस्था के दौरान दोनों ही समय में महिलाओं का वजन उनकी उम्र से कम ही पाया जाता है। विभिन्न ग्रामों के टीकाकरण कार्यक्रम कवर करने के पर महिलाओं के स्वास्थ्य को करीब से जानने का मौका मिला। ग्रामों में ज्यादातर महिलाओं का वजन उनकी उम्र से कम ही पाया गया और लगभग सभी में हिमाग्लोबिन की कमी भी थी। पिपरिया विकासखंड के ग्राम तरौनकला की एएनएम ने बताया कि यदि खून का रंग लाल नहीं होता फिका सा होता है तो उसमें हिमोग्लोबिन की कमी है और मेरे सामने बनाई गई लगभग सभी स्लाइड का रंग फीका ही था । टीका लगवाने आई रेखा दुबे गर्भवति है जब उन्होंने अपना वजन किया तो 45 किलो निकला जबकि उनका कहना था कि पिछले महिने भी उनका वजन 45 किलो ही था । जबकि गर्भ के दौरान हर महिने वजन बढ जाता है वहीं भागवती बाई 27 साल की है और उनका वनज मात्र 35 किलो ये तो चंद उदाहरण हैं गांव की अधिकतर महिलाओं का वजन अपनी उम्र से काफी कम होता है। इस तरह की महिलाएं ही हाई रिस्क में आती है, लेकिन उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता और यह उन्हीं 15 प्रतिशत में शामिल है, जिनके केस बिगड सकते हैं।
भारत की आबादी में आधे से अधिक महिलाएं और 24 प्रतिशत पुरूष एनीमिया के शिकार है। राष्टीय परिवार सर्वेक्षण के मुताबिक एनीमिक महिलाओं का प्रतिशत बढता जा रहा है। जहां एनएफएचएस 2 में 52 फीसदी शादी शुदा महिलाएं एनीमिक थी वहीं एनएफएचएस 3 में 56 हो गई। वहीं एनएफएचएस 2 के मुताबिक 50 प्रतिशत गर्भवति महिलाएं एनीमिक थी और एनएफएचएस 3 में बढकर 59 हो गया है । एनएफएचएस 3 के मुताबिक मध्यप्रदेश में 6 से 35 माह के 82.6 प्रतिशत बच्चे एनिमिक पाएं गए जो एनएफएचएस 2 में 71.3 थे ।