Monday, November 1, 2010

मौते हुई................... मगर इलाज का जरिया वहीं

बहुत पुराना डाक्टर है और रात - बेरात कहां जाएं दिखाने यहां नहीं तो और कहां दिखाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी नहीं बच पाई......... दो- तीन दिन से सिर में दर्द था तो यहीं के डाक्टर को दिखाया। बाटल इंजेक्शन लगाने के बाद भी ठीक नहीं हुई। अगले दिन डाक्टर ने कह दिया बाहर ले जाओ । पिपरिया के एक प्राइवेट अस्पताल के दरवाजे पर ही दम तोड़ दिया ।
पति तो पहले ही चल बसा था अब ये भी चली गई इस बच्चे के सिर से तो दोनों का साया उठ गया। यह कहानी हैं बसंती बाई की, जो होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील से सटे ग्राम खैरीकलां की रहवासी थी । गांव वालों ने बताया कि जब की कोई अचानक कोई बीमार होता है तो यहीं के डाक्टर को दिखाते हैं।
इन्हीं की पडोसी रामरति को भी ठीक ऐसी ही परेशानी हुई। रामरति के परिवार वालों ने बताया कि एक-दो दिन से सिर में दर्द था एक दिन यहां दिखाने के बाद आराम नहीं मिला तो पिपरिया के सरकारी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टर ने बताया कि तीन डंडी वाला बुखार है फिर बाटल और दवांईया दी । अस्पताल में एक दिन रूकने के बाद घर आ गए मगर उसे अभी भी आराम नहीं है। बहुत कमजोर हो गई है और चक्कर आते रहते है।
दोनों गौड आदिवासी महिलाएं थी जिन्हें असल में मलेरिया हो गया था, लेकिन समय पर ठीक इलाज नहीं हो पाने के कारण एक की मौत हो गई और दूसरी की तबीयत काफी बिगड गई। सरकार झोला छाप डाक्टरों को खत्म करने की बात करती है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि परेशानी में यही डाक्टर उन लोगों के काम आते हैं। यह भी सही है कि इलाज के नाम पर वह बीमार व्यक्ति पर दवांईयां आजमाते है क्योंकि सही बीमारी का पता तो उन्हें नहीं रहता और इसी में कई बार व्यक्ति अपनी जान गंवा देते हैं या दूसरी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हमारे आसपास होंगे जिनमें इन डाक्टरों की वजह से परेशानी खड़ी हुई है। ग्राम खैरीकलां से लगे तरौन ग्राम में भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि एक दिन काम करते हुए एक मजदूर का हाथ मशीन में आ गया और तुरंत गांव के डाक्टर को दिखाया तो उसने पता नहीं कौन सी दवांई दी जिससे उसके पूरे शरीर में खुजली मचने लगी और लाल दाने उभर आएं मुंह के अंदर तक लाल दाने हो गए थे। फिर उसे पिपरिया सीएचसी में दिखाया उसके काफी दिनों बाद उसे आराम लगा। कुछ कहते हैं कि डाक्टर तो काफी पुराने है, अब हमारी तो मजबूरी है एनटाइम पर इन्हें ही दिखाना पडता है।
ऐसे हालात में झोला छाप को खत्म करने के लिए गांव में डाक्टरों की नियुक्ति करना होगा, जो उनके बस की बात नहीं है। एक एएनएम तो रहने को तैयार कर नहीं पा रहे हैं फिर डाक्टर की नियुक्ति करना बहुत टेढी खीर है। एक मजदूर के घर जब कोई बीमार पडता है तो उसका असर पूरे परिवार पर पडता है क्योंकि इलाज के लिए पैसा चाहिए और वहीं तो नहीं होता उनके पास । सभी मजदूरों के हालात एक जैसे हैं यदि किसी का इलाज कराना है तो दूसरे से पैसा उधार लेकर ही करवाना होता है।
रामरति के ससुर कहते हैं कि हम तो ठहरे मजदूर आदमी रोज करते है और परिवार को खिलाते हैं। ऐसी स्थिति होने पर पैसा उधार ही लेना पडता है क्योंकि इतना पैसा हमारे पास नहीं होता । बहु बीमार हुई तो करीब 5 हजार का खर्चा हो गया अब धीरे-धीरे चुकाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद यदि व्यक्ति बच जाएं तो ठीक नहीं तो ................ । अब जो महिला खत्म हो गई उनका भी करीब इतना ही खर्चा हुआ होगा, खर्चा भी हुआ और वह भी नहीं बची । ‘‘लकडी/फाटा का काम करते हैं काम नहीं रहता तो जे बैठे हैं।‘‘
इस घटना के बाद जनपद अध्यक्ष का जवाब था कि झोलाछाप डाक्टरों पर रोक लगाना होगा, लेकिन क्या इनके अलावा गांवों में और कोई साधन हैं । हां एक ओर साधन हैं जिन्हें ओझा कहते है? जहां तक सुप्रशिक्षित डाक्टरों का सवाल है तो गांव में कोई भी आना पसंद नहीं करते। सबसेंटर भी महीने में एक बार खुलते हैं, जब टीकाकरण होना होता है। उस दिन भी सिर्फ एएनएम ही आती है।
जहां तक आंगनबाडी या आशा कार्यकर्ता की बात है तो दोनों के पास भी पर्याप्त दवांईयां नहीं होती। ऐसे में गांव वालों के पास विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ एक ही सहारा रहता है। जिन्हें बंगाली या झोलाछाप डाक्टरों के नाम से जाना जाता है।
पिपरिया से सटी तहसील सोहागपुर के गांवों में बरसात के दौरान मलेरिया फैल रहा था तो कुछ गांवों में स्वास्थ्य टीम भेजी गई उन्होंने औपचारिकता के तौर पर लोगों का इलाज खून की जांच किए बिना ही कर दिया और कुछ गांवों में तो टीम ही नहीं गई। वहां के दलित संगठन से जुड़े डा. आवटे ने बताया कि मरीजों ने जब यह बताया तो उनके खून की जांच करवाई गई तो लगभग सभी में मलेरिया पाॅजीटिव पाया गया ।
आज के वैज्ञानिक युग में भी उल्टी, दस्त और बुखार से मौत होना शायद सरकार के लिए मायने नहीं रखता होगा, लेकिन यह कोई छोटी घटनाएं नहीं है। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए जो समिति बनाई है वे भी इन मुददों पर बात करना जरूरी नहीं समझते। जब इन विषयों पर गांव के सरपंच, पंच, आंगनबाडी और आशा कार्यकर्ता से बात करते हैं तो सभी के अपने-अपने तर्क होते हैं। कोई कहता है कि पीडित पक्ष की गलती है उन्होंने समय रहते नहीं दिखाया तो कोई कहता है कि झाडा फंूकी में लगे रहे इसी का परिणाम है। किसी के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं क्योंकि वे भी डाक्टर तो नहीं है ऐसे समय में व्यक्ति की मदद डाक्टर ही कर सकता है। जब वहीं समय पर उपलब्ध नहीं है तो कोई कुछ नहीं कर सकता, लेकिन ऐसी घटनाओं के बाद भी किसी प्रकार के परिवर्तन की गुंजाईश नजर नहीं आती।
हाल ही में सरकार ने डाक्टरों को अधिक वेतन देकर गांवों में काम करने का प्रलोभन भी दिया, लेकिन यह कदम कितना कारगर होगा देखते है ? इससे तो बेहतर है कि सरकार उन बंगाली डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण देकर प्राथमिक इलाज करने के योग्य बना दे । जब एक आंठवी पास आशा या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को सरकार ने इतना अधिकार दिया है कि वे दंवाईयां दे सकें । तो कुछ ऐसे डाक्टर हैं जिनके पास लाईसेंस है तो कम से कम उन्हें विधिवत ट्रेनिंग दी जा सकती हैं।

4 comments:

  1. गरीब का मर जाना बीमार पड़ जाने से अधिक बेहतर है...

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  3. इसके लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठाने चाहिए|

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  4. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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