Friday, September 22, 2017

शक्ति को रौंदने वालों को हक नहीं मां की भक्ति का

शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि आरंभ हो चुकी है। नौदिनों तक मां दुर्गा की विधि - विधान से पूजा अर्चना की जाएगी। जगह -जगह पांडाल व झांकियां सजेगी, गरबा व डांडिया रास होंगे, कन्याभोज व भंडारे का आयोजन किया जाएगा। नौदिनों तक उल्लास का माहौल रहेगा। हम हर वर्ष मां आदिशक्ति की उपासना में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतेलेकिन कहीं न कहीं हम उपरी आडंबर यह भूल जाते हैकि नवरात्रि आंतरिक उपासना का भी पर्व है। हमारे देश में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना पूरी आस्था सेकी जाती है लेकिन आज भी शक्ति का ही स्वरूप महिलाएंअपने वजूद को तलाश रही है। मां के ही स्वरूप में आने वाली नन्हीं कलियों को बेरहमी से आज भी हमारे समाज में रौंदने वालों की कमी नहीं है। मासूम बच्चियोंसे लेकर सशक्त नारी तक कोई सुरक्षित नही ंहै। अब पापों का घड़ा भर चुका है क्योंकि पिता ही बेटी की अस्मत लूट रहे है। हमारे समाज में महिलाएं बेझिझक, निडर होकर आज भी नहीं जा पाती हैमहिला सुरक्षा जैसेगंभीर मुद्दे पर कोई कारगर कदम नहीं उठा पाया है। भ्रूण हत्याएं जारी है, नवजात बच्चियां मृत मिल रही है। आज भी समाज में बेटों की चाह कायम है यहीं नहीं पुरूषों के अलावा महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन है क्योंकि आज भी उनके मन में लड़का - लड़की का भेद याथावत हैऔर लड़का ही वंशवृद्धि का ध्योतक है। यूं तो बडे से बड़ा गुनहगार भी मां का भक्त हो सकता है लेकिन मेरी नजर में लड़कियों को हिकारत से देखने वाले, नवजात बच्चियों को कचरे केढेर में फेंक कर उन पर पत्थर रखने वालों को हक नहीं है कि वे मां की आराधना करे, किसी मासूम बच्ची या महिला को बुरी नजर से देखने वाले को हक नही ंहै कि वह मां की मूर्ति की आंखों में आंखे डालकर देखे, किसी दुष्कर्मी को हक नहीं है कि वह मां के पांडाल केसमीप तक जाएं, कोख में की बेटी को मारने वाले को मां की उपासना का हक नहीं दिया जा सकता। इसी तरह चलोंअब एक लड़का और हो जाएं तो अच्छा ऐसे कहने वालो कोभी एक बार अपने अंदर से इस भेद को मिटाकर ही मां के आगे शीश नवाना चाहिए ।

Tuesday, March 26, 2013

देश की नींव को कमजोर कर रहा गठबंधन


देश में कुकुरमु̣ो की तरह उग आई क्षेत्रीय पार् ियों ने देश को खोखला कर दिया है। राष्ट्रीय पार् ी की बां और गद्दी की भूख ने देश में धीरे-धीरे छो ी-छो ी पार् ियों को जन्म दिया, जो आगे चलकर जोह रहा हमारे देश की राजनीति धेग̀डो पर चल रही है। विचारों की असमानता उन राज्यों की बागडोर संभालने लगी। समय गुजरता गया और देश के हालात भी बदलते गए राष्ट्रीय छवि के नेताओं के साथ राष्ट्रीय पार् ियों का दौर भी खत्म हो गया। अब देश की सरकार यहां वहां से थेग̀डा लगा कर चल रही है। जब किसी की मांग पूरी नहीं होती तो वह अपना हाथ खींच लेता है और सरकार की नैय्या डगमगाने लगती है। इसी से राजनीतिक अस्थिरता के दौर का उदय होता है। आज हमारा देश राजनीतिक अस्थिरता से ही गुजर रहा है। कई क्षेत्रीय पार् ियों के सहयोग से चल रही सरकार पर आए दिन संक अपना दबदबा बनाए रखना चाहती है और जब उसे अपना उल्लू सीधा होता नहीं दिखता तो वह सरकार से हाथ खींच लेती है। इस तरह सरकार छो ी-छो ी पार् ियों के रहमोकरम पर चलती रहती है। देश में आज क्षेत्रीयता इस तेजी से हावी हुई है कि वर्तमान में एक देश एक पार् ी का सपना तो सपने में भी नहीं देखा जा सकता। गठबंधन की राजनीति ने राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी है। सरकार को विपक्ष के साथ-साथ अपने घ क दलों का विरोध भी झेलना प̀डता है। गठबंधन की शुरूआत और परिणाम सबसे पहले १९६२ में गठबंधन की राजनीति की शुरूआत हुई थी। उसके बाद कांग्रेस ने एक क्षत्र राज किया। फिर १९९६ में अ ल जी के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी और तब से यह सिलसिला अनवरत जारी है। राज्यों में क्षेत्रीय पार् ियों की पैठ के बाद राष्ट्रीय पार् ी अपनी भूमिका ठीक ढंग से नहीं निभा पाई उसी का परिणाम हम आज तक झेल रहे हैं। गठबंधन से देश को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ है। पहली बात तो गठबंधन में पार् ियों के बीच हर मुद्दे पर आम सहमति बन पाना उतना आसान नहीं होता। इसमें समय और उर्जा दोनों की ज्यादा खपत होती है हर पार् ी पहले अपने हित साधने की कोशिश करती है और बाद में पूरे गठबंधन के हित के बारे में सोचा जाता है। इसके चलते देश के विकास पर ध्यान कम और आपसी मतभेद को सुलझाने में समय ज्यादा खर्च होता है। वैसे मतभेद तो एक पार् ी के कार्यकर्ताओं में भी हो सकते है, लेकिन उन्हें सुलझाने में व̣ाâ कम जाया होता है और शीघ्र उसका हल निकाल लिया जाता है। लेकिन पार् ियां भिन्न होेने पर बात को लंबा खींचा जाता है और हर हाल में अपने पक्ष को मजबूत करने का प्रयास किया जाता है। जब मिली जुली सरकार होती है तो कभी भी आफत आ सकती है। पिछले दिनों यूपीए-२ से ममता बेनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था। पहले उन्हीें के कहने पर सरकार ने रेल मंत्री बदला और बाद में उन्हीं ने साथ छो̀ड दिया। यानि कुलमिलाकर हर ओर अस्थिरता रहती है मंत्रियों को मंत्रालय सौंपने से लेकर कोई भी पैâसला करने में प्रमुखों पर तलवार ल कती रहती है। आज है कल नहीं के बीच पेंडुलम की तरह ल कती सरकार किसी भी के बादल छाए रहते है। क्योंकि हर पार् ी अपने राज्य में लिहाज से देश के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

Tuesday, January 8, 2013

हैवानों के हौसलों को पस्त करने के लिए, वक्त अब कानून में बदलाव का है

हैवानों के हौसलों को पस्त करने के लिए, वक्त अब कानून में बदलाव का है
दिल्ली में 16 दिसंबर को हुई दिल दहला देने वाली घटना के बाद एक ओर जहां आवाम में रोष व्याप्त है वहीं दूसरी और राजनीतिज्ञों व धर्म गुरू आसाराम बापू के बेतुके बयानों से समाज षर्मसार है। वहीं हाल ही में चष्मदीद के बयान ने सभी को हिला दिया है उसने पुलिस के रर्वैए पर भी सवालिया निषान लगा दिया है। इस घटना ने हर किसी को झकझौर कर रख दिया है। यू ंतो हमारे देष में रोजाना कहीं न कहीं महिलाओं से अत्याचार व दुराचार होता ही रहता है, लेकिन इस घटना ने समाज के सजग वर्ग को तो जगा दिया है। लेकिन क्या सिर्फ विरोध प्रदर्षन से रेप जैसे गंभीर अपराधों पर रोक लग सकेगी । वर्तमान में चैतरफा विरोध होने के बाद भी महिलाओं से होने वाली छेडछाड और रेप की घटनाएं लगातार जारी है। जब तक अपराध करने वालों के दिल में दहषत नहीं जागेगी तब तक ऐसे अपराधों में कमी आने का प्रष्न ही नहीं उठता। इस जघन्य अपराध के बाद भी देष के जनप्रतिनिधियों ने जिस तरह के बयान दिए है उससे तो साफ जाहिर होता है कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद ही करना होगा क्योंकि अब तक जितने भी बयान आए है सभी कहीं न कहीं महिलाओं को भी जिम्मेदार मान रहे है। ऐसे संवेदनषील मामलों पर भी राजनेता राजनीति करने से बाज नहीं आते है। आज समाज में महिलाओं की सुरक्षा बहुत बडा प्रष्न है हर कोई गिदद की तरह महिलाओं पर नजर जमा कर बैठा है। यदि इस समस्या की जड पर विचार किया जाए तो हम पाएंगे कि आज 10 -12 साल की उम्र में बच्चे वो समझ विकसित हो गई है जिसके बारे में 10 साल पहले हम सोच भी नहीं सकते थे। जिस तेजी से आधुनिक सुविधाएं बढी है और समाज की तस्वीर बदली है। व्याभिचार सबसे अधिक पनप रहा है और जब तक बचपन से ही बच्चों के दिल में महिलाओं के प्रति बेहतर सोच विकसित नहीं होगी तब तक व्याभिचाररहित समाज का निर्माण संभव नहीं है। लोगों की गंदी सोच को किस तरह परिवर्तित किया जाए इसके लिए बस एक ही निदान है कि दंड को इतना कठोर कर दिया जाए कि कोई भी अपराध करने से पहले उसके अंजाम से ही सिहर उठे । महिला की अस्मिता कोई मामूली बात नहीं है । आज देष के हर कौने से हमें महिलाओं के लिए सिर्फ इसी तरह की बातें सुनने को मिल रही है तो क्या जब जिसका मन करेगा वह महिला की इज्जत को तार-तार करके चलता बनेगा और उसे सजा मिलने में इतना समय लगेगा तब तक उसका विष्वास और आस ही टूट चुकी होगी । खैर अब सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से जुडे मामलों पर षीघ्र फैसला लेने की बात कहीं है। देष की बेटी ने अपना बलिदान देकर लोगों को जगा तो दिया है, लेकिन इस आंदोलन की आग को दूसरे आंदोलनों की तरह बुझने नहीं देना है क्योंकि यह कोई छोटा मामला नहीं है। अपराध बहुत बरसों से होता आ रहा है, लेकिन सजा में अब कोई न कोई परिवर्तन करने का समय आ गया है। इस तरह के हैवानियत भरे कर्म के बाद निर्मम हत्या करने वालों को षीघ्र सजा होनी चाहिए। वहीं रेप करने वाले नाबालिको के मामले में भी अब कठोर निर्णय लेने का वक्त आ गया है। जब नाबालिक होते हुए किसी महिला की अस्मिता से खेल सकते है तो फिर सजा देेते समय उसे नाबालिक मानना क्या उचित है। अपराध की गंभीरता को देखते हुए नाबालिकों के मामले में भी उम्र को कम करने पर विचार करना होगा और उन नाबालिकों की अक्ल भी ठिकाने लगानी होगी। बरसों पुरानी जंजीरों को तोडकर बमुष्किल महिलाओं ने चैके के साथ-साथ बाहर निकलने का निर्णय लिया था, लेकिन समाज के चंद हैवानों ने उनकी राहों को और मुष्किल कर दिया है। रेप जैसे जघन्य अपराध के बढते मामलों से कहीं महिलाओं के हौसले सिथिल न पड जाएं। आज भी महिलाओं की सफलता सभी के गले नहीं उतरती और देखा गया है कि घर सहित बाहर भी उन्हें दबाने की भरसक कोषिष की जाती है, लेकिन यदि महिलाएं सफल होती है तो अपने आत्मविष्वास और अपनों के सहयोग के बल पर । महिलाओं की उपस्थिति के बिना आखिर यह समाज है ही क्या और इसका अस्तित्व ही क्या है। इतनी बडी सच्चाई से वाकिफ होने के बाद भी महिलाओं को कुचलने का कोई भी मौका हैवान नहीं छोडते है। अब वक्त आ गया है कि सरकार ऐसे सषक्त सिस्टम को तैयार करे जो महिलाओं को भरपूर सुरक्षा दे और महिलाओं पर होने वाले अपराधों के खिलाफ डट कर खडे रहे। वहीं राजनेताओं को बडबोले बयान छोडकर एक बेहतर कानून को बनाने की पहल करना चाहिए ताकि अंजाम देखकर ही अपराधियों के हौसले पस्त हो जाए। आध्यात्म भी हमें ऐसे मामलों से कैसा निपटा जाए इसका बेहतर रास्ता दिखाते है। यहां षिवमहापुराण के उस अध्याय का जिक्र करना जरूरी है, जिसमें ़ऋषि गौतम ने इंद्रदेव को अहिल्यादेवी से छल करने पर पुरूष्त्वहीन होने का श्राप दिया था। आध्यात्मिक किताबों से सीख लेकर भी हम सजा को कठोर कर सकते है। बढते व्याभिचार को रोकने के लिए महिलाओं को आत्मरक्षा के गुर भी सीखने चाहिए ताकि आवष्यकता पडने पर वह अपनी मदद खुद भी कर सकें । समाज को इतना सजग होना होगा कि ऐसे मामलों में कोई चुप न बैठे और आवाज उठाएं ताकि आरोपियों के हौसले पस्त हो जाए । महिला की रूह तक को छलनी कर देने वाली इन घटनाओं पर अंकुष लगाने के लिए चैतरफा पहल की जरूरत र्है और राजनेताओं को भी इस मामले में नैतिकता का प्रमाण देना चाहिए यह नहीं कि बेतुका बयान देकर पल्ला झाड लें आखिर जनता ने उन्हें उनका जनप्रतिनिधि बनाकर बिठाया है तो उनकी सुरक्षा का फर्ज उनकी भी बनता है। वक्त आ गया है बदलाव का ........

Monday, November 1, 2010

मौते हुई................... मगर इलाज का जरिया वहीं

बहुत पुराना डाक्टर है और रात - बेरात कहां जाएं दिखाने यहां नहीं तो और कहां दिखाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी नहीं बच पाई......... दो- तीन दिन से सिर में दर्द था तो यहीं के डाक्टर को दिखाया। बाटल इंजेक्शन लगाने के बाद भी ठीक नहीं हुई। अगले दिन डाक्टर ने कह दिया बाहर ले जाओ । पिपरिया के एक प्राइवेट अस्पताल के दरवाजे पर ही दम तोड़ दिया ।
पति तो पहले ही चल बसा था अब ये भी चली गई इस बच्चे के सिर से तो दोनों का साया उठ गया। यह कहानी हैं बसंती बाई की, जो होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील से सटे ग्राम खैरीकलां की रहवासी थी । गांव वालों ने बताया कि जब की कोई अचानक कोई बीमार होता है तो यहीं के डाक्टर को दिखाते हैं।
इन्हीं की पडोसी रामरति को भी ठीक ऐसी ही परेशानी हुई। रामरति के परिवार वालों ने बताया कि एक-दो दिन से सिर में दर्द था एक दिन यहां दिखाने के बाद आराम नहीं मिला तो पिपरिया के सरकारी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टर ने बताया कि तीन डंडी वाला बुखार है फिर बाटल और दवांईया दी । अस्पताल में एक दिन रूकने के बाद घर आ गए मगर उसे अभी भी आराम नहीं है। बहुत कमजोर हो गई है और चक्कर आते रहते है।
दोनों गौड आदिवासी महिलाएं थी जिन्हें असल में मलेरिया हो गया था, लेकिन समय पर ठीक इलाज नहीं हो पाने के कारण एक की मौत हो गई और दूसरी की तबीयत काफी बिगड गई। सरकार झोला छाप डाक्टरों को खत्म करने की बात करती है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि परेशानी में यही डाक्टर उन लोगों के काम आते हैं। यह भी सही है कि इलाज के नाम पर वह बीमार व्यक्ति पर दवांईयां आजमाते है क्योंकि सही बीमारी का पता तो उन्हें नहीं रहता और इसी में कई बार व्यक्ति अपनी जान गंवा देते हैं या दूसरी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
ऐसे कई उदाहरण हमारे आसपास होंगे जिनमें इन डाक्टरों की वजह से परेशानी खड़ी हुई है। ग्राम खैरीकलां से लगे तरौन ग्राम में भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि एक दिन काम करते हुए एक मजदूर का हाथ मशीन में आ गया और तुरंत गांव के डाक्टर को दिखाया तो उसने पता नहीं कौन सी दवांई दी जिससे उसके पूरे शरीर में खुजली मचने लगी और लाल दाने उभर आएं मुंह के अंदर तक लाल दाने हो गए थे। फिर उसे पिपरिया सीएचसी में दिखाया उसके काफी दिनों बाद उसे आराम लगा। कुछ कहते हैं कि डाक्टर तो काफी पुराने है, अब हमारी तो मजबूरी है एनटाइम पर इन्हें ही दिखाना पडता है।
ऐसे हालात में झोला छाप को खत्म करने के लिए गांव में डाक्टरों की नियुक्ति करना होगा, जो उनके बस की बात नहीं है। एक एएनएम तो रहने को तैयार कर नहीं पा रहे हैं फिर डाक्टर की नियुक्ति करना बहुत टेढी खीर है। एक मजदूर के घर जब कोई बीमार पडता है तो उसका असर पूरे परिवार पर पडता है क्योंकि इलाज के लिए पैसा चाहिए और वहीं तो नहीं होता उनके पास । सभी मजदूरों के हालात एक जैसे हैं यदि किसी का इलाज कराना है तो दूसरे से पैसा उधार लेकर ही करवाना होता है।
रामरति के ससुर कहते हैं कि हम तो ठहरे मजदूर आदमी रोज करते है और परिवार को खिलाते हैं। ऐसी स्थिति होने पर पैसा उधार ही लेना पडता है क्योंकि इतना पैसा हमारे पास नहीं होता । बहु बीमार हुई तो करीब 5 हजार का खर्चा हो गया अब धीरे-धीरे चुकाएंगे। इतना पैसा खर्च करने के बाद यदि व्यक्ति बच जाएं तो ठीक नहीं तो ................ । अब जो महिला खत्म हो गई उनका भी करीब इतना ही खर्चा हुआ होगा, खर्चा भी हुआ और वह भी नहीं बची । ‘‘लकडी/फाटा का काम करते हैं काम नहीं रहता तो जे बैठे हैं।‘‘
इस घटना के बाद जनपद अध्यक्ष का जवाब था कि झोलाछाप डाक्टरों पर रोक लगाना होगा, लेकिन क्या इनके अलावा गांवों में और कोई साधन हैं । हां एक ओर साधन हैं जिन्हें ओझा कहते है? जहां तक सुप्रशिक्षित डाक्टरों का सवाल है तो गांव में कोई भी आना पसंद नहीं करते। सबसेंटर भी महीने में एक बार खुलते हैं, जब टीकाकरण होना होता है। उस दिन भी सिर्फ एएनएम ही आती है।
जहां तक आंगनबाडी या आशा कार्यकर्ता की बात है तो दोनों के पास भी पर्याप्त दवांईयां नहीं होती। ऐसे में गांव वालों के पास विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ एक ही सहारा रहता है। जिन्हें बंगाली या झोलाछाप डाक्टरों के नाम से जाना जाता है।
पिपरिया से सटी तहसील सोहागपुर के गांवों में बरसात के दौरान मलेरिया फैल रहा था तो कुछ गांवों में स्वास्थ्य टीम भेजी गई उन्होंने औपचारिकता के तौर पर लोगों का इलाज खून की जांच किए बिना ही कर दिया और कुछ गांवों में तो टीम ही नहीं गई। वहां के दलित संगठन से जुड़े डा. आवटे ने बताया कि मरीजों ने जब यह बताया तो उनके खून की जांच करवाई गई तो लगभग सभी में मलेरिया पाॅजीटिव पाया गया ।
आज के वैज्ञानिक युग में भी उल्टी, दस्त और बुखार से मौत होना शायद सरकार के लिए मायने नहीं रखता होगा, लेकिन यह कोई छोटी घटनाएं नहीं है। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए जो समिति बनाई है वे भी इन मुददों पर बात करना जरूरी नहीं समझते। जब इन विषयों पर गांव के सरपंच, पंच, आंगनबाडी और आशा कार्यकर्ता से बात करते हैं तो सभी के अपने-अपने तर्क होते हैं। कोई कहता है कि पीडित पक्ष की गलती है उन्होंने समय रहते नहीं दिखाया तो कोई कहता है कि झाडा फंूकी में लगे रहे इसी का परिणाम है। किसी के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं क्योंकि वे भी डाक्टर तो नहीं है ऐसे समय में व्यक्ति की मदद डाक्टर ही कर सकता है। जब वहीं समय पर उपलब्ध नहीं है तो कोई कुछ नहीं कर सकता, लेकिन ऐसी घटनाओं के बाद भी किसी प्रकार के परिवर्तन की गुंजाईश नजर नहीं आती।
हाल ही में सरकार ने डाक्टरों को अधिक वेतन देकर गांवों में काम करने का प्रलोभन भी दिया, लेकिन यह कदम कितना कारगर होगा देखते है ? इससे तो बेहतर है कि सरकार उन बंगाली डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण देकर प्राथमिक इलाज करने के योग्य बना दे । जब एक आंठवी पास आशा या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को सरकार ने इतना अधिकार दिया है कि वे दंवाईयां दे सकें । तो कुछ ऐसे डाक्टर हैं जिनके पास लाईसेंस है तो कम से कम उन्हें विधिवत ट्रेनिंग दी जा सकती हैं।

Wednesday, September 29, 2010

रोटी की जुगत

श्रद्धा मंडलोई
बीमारों का इलाज और दो जून रोटी की जुगत में कट रही जिंदगी
दुनिया मंे हम आए हैं तो जीना ही पडेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पडेगा...... मदर इंडिया का यह गीत सुनते ही संघर्षरत नरगिस का चेहरा हमारे सामने उभर आता है। फिल्म में नरगिस का किरदार हर मुश्किलों से लडते हुए अपने परिवार का पेट पालती है। इस फिल्म ने कई रिकार्ड तोडे और नरगिस की अलग छवि उभर कर सामने आई, लेकिन हमारे आसपास भी ऐसी कई मदर इंडिया है जिन्हें हम नहीं देख पा रहे है । आइए आपकी पहचान कुछ ऐसी ही मदर इंडिया से करवाते है जो घर के साथ बाहर की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही है।
सुशीला बाई लकडियों का गटठा बांधने में व्यस्त कल की रोजी रोटी की तैयारी कर रही है। मंगलदास बाहर आंगन में रखे बिस्तर पर लेटे हुए है। जैसे ही मैंने घर में प्रवेश किया तो मंगलदास उठने की कोशिश करने लगे और सुशीला बाई ने रस्सी बांधते हुए मुडकर देखा और बोली काय कौन है। फिर मेरी तरफ मुडते हुए बोली का बात है। धीरे - धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ। सुशीला बाई बताती है कि परिवार में कमाने वाली और बनाने वाली मैं ही हूं। छोटा बेटा और बहू दोनों टीबी के मरीज है और पति असहाय हो गए है। पैसों के अभाव में पति का इलाज भी नहीं हो पा रहा है । बेटे के इलाज के लिए थोडे बहुत रकम थी वह गिरवी रख दी। बीमारियों ने मुझे बहुत तोड दिया है। मजूरी करके या जंगल से लकडी बीनकर बेचती हूं जितना मिल जाएं उसी में कर खा रहे है। का करे जिंदगी तो कांटना पडेगा। सुशीला बाई खुद 60 बरस की है लेकिन परिवार की खातिर इस उम्र में भी दोनों जिम्मेदारिया बखूबी निभा रही है। वे बताती है कि लकडियों के गटठे के कभी किसी ने गरीब समझकर 50 रूपए दे दिए तो खूब हो जाता है नही तो 20-30 रूपए मंे ही घर चलाना पडता है। रोज खाने को मिले ऐसा जरूरी नहीं हैं। झोपडी नुमा घर तीन टुकडों में बंटा हुआ है एक तरफ बडा और दूसरी तरफ छोटा बेटा रहता है, लेकिन छोटे बेटे और पत्नी को जब से टीबी हुई है मां ही बनाकर खिला रही है। राशन कार्ड पर जितना राशन मिल रहा है बस उसी पर निर्भर है। राशन में भी सिर्फ 20 किलो गेंहू और 2 किलो शक्कर मिल रही है। पांच लोगों में वह कब तक पूरा पडेगा। झोपडी की मरम्मत के लिए इंदिरा आवास के तहत पंचायत से सात हजार रूपए का चैक मिला है, लेकिन चैक टूट ही नहीं रहा है उसे लेकर इधर - उधर घूम रहे हैं। सुशीला बाई से जब कहा कि आपने गांव की समीति से इस बारे में कोई बात की तो उन्होंने कहा कि कौन सी समीति। यानि ग्रामीणों को यह नहीं पता कि यदि उनके स्वास्थ्य सेे जुडी कोई समस्या है तो उसे ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समीति के साथ बांट सकते हैं। सुशीला बाई ने कहा कि इलाज में मेरे जितने गहने थे वे भी बिक गए और अब हाथ में कुछ नहीं है। ऐसे हालात में समीति उनकी सहायता कर उन्हें दीनदयाल अंतोदय योजना या अन्य योजना का लाभ दिला सकती थी। लेकिन समीति की भूमिका यहां भी लचर ही रही।
यह तो शुरूआत है पिपरिया से करीब 10 किलोमीटर दूर ग्राम रिछैडा में ऐसी कई महिलाएं है जो परिवार का पालन कर रही है। गांव की आशा हेमलता दुबे 36 वर्ष के पति कैलाश दुबे विकलांग है। हेमलता ने बताया कि शादी के दस साल बाद गले की नस चिपट जाने से विकलांग हो गए थे। तब से घर की जिम्मेदारी मेरे उपर आ गई। हेमलता के तीन बच्चे है पति की हालत दिन-ब-दिन गिरती जा रही है। लंबे समय तक इलाज कराने के बाद भी कोई अंतर नहीं पडा। नागपुर के सीम्स अस्पताल में भी दिखाया लेकिन कुछ अंतर नहीं आया । हेमलता ने बताया कि डाक्टर का कहना है कि आपरेशन में रिस्क है और जरूरी नहीं की इनकी जान बच पाए । डाक्टर के ऐसा कहने के बाद घर वालों की राय ली तो सभी ने कहा कि वे अभी दिख तो रहे है तुम तो घर आ जाओ तो घर ले आए । अब पैसा भी इतना नहीं है कि रोज दवा करा सके । टीकाकरण और जितने केस मिल जाएं उसी पर परिवार चल रहा है। पति बिल्कुल असहाय हो गए है वे बिस्तर पर ही रहते है। नहलाने से लेकर शौच सहित सभी काम बिस्तर पर ही होते है। दिन ब दिन उनकी हालत गिरती जा रही है।
पैतीस वर्षीय मुन्नीबाई के पति का एक साल पहले निधन हो गया उनके पांच बच्चे है। मुन्नीबाई मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पाल रही है। बच्चों को पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलने के कारण बच्चे कमजोर भी है। पचास वर्षीय गौरा नागवंशी अपनी मां और भतीजी के साथ रहती है और रोज मजदूरी करके घर चला रही है। गौरा बाई बताती है कि यदि यहां की बाईयां काम न करें तो आदमी भूखे मर जाएंगे । गौरा की मां बीमार है वे गिर गई थी तब से चलने में बहुत परेशानी है। उनसे कुछ करते नहीं बनता। पैसा नहीं होने के कारण उनका इलाज भी नहीं हो पा रहा है। सरकारी अस्पताल में दिखाया था मगर आराम नहीं लगा । पचपन वर्षीय घसीटी बाई भी अपने दम पर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है।
गावं में अधेड उम्र की महिलाएं हर समस्या का डट कर सामना कर रही है। जितनी भी महिलाएं अपने दम पर घर चला रही है उनके परिवार में कोई न कोई बडी बीमारी से ग्रस्त है। मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाली महिलाओं को बाहर से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल पा रही है। इस उम्र मंे भी जैसे बन रहा है वैसे अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही है। ये कामकाजी महिलाएं बताती है कि कभी -कभी तो जिंदगी बहुत बोझ लगने लगती है लेकिन फिर घर वालों का मुंह देखकर जीना पडता है। ऐसा लगता कि कि आखिर क्या करें कि रोज रोटी और घरवालों का इलाज दोनों काम अच्छे से चलते रहे, लेकिन पढे - लिखे नहीं होने के कारण कोई दूसरा काम भी नहीं मिलता है। फिर जैसा काम मिलता है करना पडता है। सुुशीला बाई कहती है कि बस रोज यही सोच कर घर से निकलती हूं कि इतना मिल जाएं कि घर वालों को भूखा न सोना पडे। कभी - कभी तो ऐसा होता है कि कंटोल की दुकान से राशन लेने के लिए भी पैसा नहीं होता है।

Monday, September 6, 2010

कम उम्र में बडे बोझ के भार से दब जाती हैं बेटियां

चार साल की उम्र में उसके सिर पर घडा रखने की जिम्मेदारी आ जाती है। छह साल की होते ही अपने छोटे भाई - बहनों और चूल्हा-चोका संभालने की जिम्मेदारी और इसके दो साल बाद उसकी पढाई छूट जाती है । वह बच्ची की उम्र में आधी मां बन जाती है। बालिक होने के पहले ही उसने आधी जिंदगी जी ली है। कुछ ही समय बाद माता - पिता के लिए बेटी सयानी हो जाएगी और अब उसकी डोली उठने की तैयारी होने लगती है। 15 - 16 साल की होते होते उसका ब्याह हो जाता है। शादी के कुछ ही समय बाद वह पूरी मां बन जाती है और साथ ही दूसरे घर के पूरे सदस्यों की जिम्मेदारी भी उस पर आ जाती है। अब वह बच्चों की जिम्मेदारी संभालने के साथ बाहर का काम भी करती है। इतनी बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालने वाली को ही आखिर हमारे समाज में बोझ क्यों समझा जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है भारतीय महिलाओं की, जो बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालते-संभालते उम्र से पहले ही बडी हो जाती है। सभी का ख्याल रखते-रखते वह अपना ख्याल रखना भूल जाती है। बस इन्हीं कारणों से देश की महिलाएं कमजोर होती है और उनमें एनीमिया, हिमोग्लोबिन कम होता है। यहीं लडकी जब मां बनती है तो कमजोर होने के कारण बच्चों में कुपोषण होता है और शिशु मृत्यु और मातृत्व मृत्यु के लिए भी कहीं न कहीं यहीं जीवन शैली जिम्मेदार है। देश की महिलाओं और बच्चों में होने वाली समस्यों का सबसे बडा कारण गरीबी और दूसरा कारण महिलाओं को कम उम्र में सौपी जाने वाली जिम्मेदारियां है।
जहां एक ओर महिलाएं अंतरिक्ष में कदम रख रही है और हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है वहीं गांवों में आज भी महिलाएं लंबा घूंघट लेती है और 15 साल की उम्र में बच्चों की मां बन चुकी होती है। चाहे मघ्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के ग्राम पचुआ ,रिछैडा हो या छिंदवाडा जिले के बोरीमाल और कोकट लगभग सभी ग्रामों की यही कहानी है। वर्तमान में भारत में करीब 56 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार हंै। इसका सबसे बडा कारण गांव की लडकियों का अपनी उम्र से पहले ही बडी होना माना जा सकता है।
गांव में अब भी महिलाएं पुरूषों के सामने पर्दे में ही रहती है और घर के बडों की उपस्थिति में नहीं बोलती। पहुंच मार्ग से अंदर के गांवों में हालात बहुत ही गंभीर है यहां महिलाएं न तो अपनी उम्र ठीक से जानती है और अन्य जरूरी बातों से भी अंजान है। यहां उन्हें समझाने वाला भी कोई नहीं है। कई गांवों में आंगनबाडी कार्यकर्ता दूसरे ग्रामों से आती है इसलिए वह उन्हें पर्याप्त समय नहीं दे पाती और कुछ स्थानों पर सहायिका बहुत ही कम पढी-लिखी है उन्हें स्वयं कई बातों का ज्ञान नहीं है। महिलाओं को गर्भवस्था के दौरान कई बातों का ध्यान रखना होता है। घर के बढे तो उन्हें समझाते है लेकिन मेडिकल की दृष्टि से भी कई बाते जरूरी होती है, जो उन्हें जानना जरूरी है, लेकिन कोई उन्हें सही सलाह देने वाला नहीं है। जहां तक माॅनीटरिंग का सवाल है तो पहुंच मार्ग से दूर बसे गांव में साल में एक या दो बार ही निरीक्षण होता है। जहां तक ग्रामीण स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समीति की बात करें तो अभी कई ग्रामों में यह समिति नहीं बनीं है। जहां बनी है वहां समीति के सदस्यों को ही पता नहीं है कि वे समीति का हिस्सा है तो अपनी जिम्मेदारी निभाना तो दूर की बात है। समिति की सदस्य एवं सचिव आशा कार्यकर्ता होती है उनकी भी अपनी कई समस्याएं हैं जैसे कुछ क्षेत्रों की महिलाएं आसानी से बातों को नहीं समझती ऐसा ही उदाहरण होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड के ग्राम रिछैडा में सामने आया। रिछैडा आदिवासी बहुल क्षे़त्र है और जंगल से लगा हुआ है। वहां की आशा कार्यकर्ता ने बताया कि टीका लगवाने से लेकर परिवार नियोजन सभी के लिए महिलाओं को समझाना बहुत टेढी खीर है। कई बार यदि महिलाएं मान जाएं तो उनके पति और घर के बडो को समझाना मुश्किल हो जाता है। कई सयानी महिलाएं कहती है कि हमें इतने बच्चे हो गए हमें तो कोई टीके नहीं लगे और सब बच्चे चंगे भले जन गए , जो तो बस ढकोसला है। यानि महिलाओं के निर्णय वे खुद नहीं लेती या तो उनके पति लेते है या उनके बडे - बुजुर्ग। महिला घर के हर सदस्य का पूरा ख्याल रखती है, लेकिन उसकी जरूरत और उसका ख्याल रखने वाला कोई नहीं होता है। उसके निर्णय में भी सभी का राजी होना जरूरी होता है।
आशा कार्यकर्ता कहती है कि महिलाओं को समझाने के लिए उनका शिक्षित होना बहुत जरूरी है, लेकिन जहां तक पढाई का सवाल है तो लडकियों को पढाने की अपेक्षा घर का काम कराना ज्यादा महत्वपूर्ण समझा जाता है। इसीलिए सपना कह बैठती है किं चाहती तो मैं भी हूं पढना पर छोटे भाईयों को कौन संभालेगा मां तो बनहारी पर जाती है मासूम सपना अपनी मासूमीयत में इतनी बडी बात कह बैठती है जो हमारे गांवों की सच्चाई को बयां करती है। सपना जैसी ही न जाने कितनी लडकियां हमारे गांवों में अपनी कई इच्छाओं को दबाएं अपना जीवन कांट रही है। इनमें से कई तो इसी को अपना जीवन मान चुकी है। इन लडकियों के नाम स्कूल में दर्ज होेते है , लेकिन मां के बनहारी पर जाने के कारण वह चाहकर भी स्कूल नहीं जा पाती। वहीं यह भी देखा गया कि जब लडकी समझदार हो जाती है तो उसकी पढाई खुद -ब -खुद छूट जाती है। पैदा होते ही उसकी जिम्मेदारियां अपने आप ही तय हो जाती है लडका और लडकी के बीच आज भी जमीन - आसमान का अंतर है। पानी भरने से लेकर घर का हर काम सिर्फ वहीं करेगी क्योंकि वह लडकी हैै। जंगल से महुआ, गुल्ली और अचार इत्यादि बीनना उसी का काम है। विभिन्न ग्रामों के टीकाकरण कार्यक्रम के दौरान कई तरह की सच्चाई सामने आई। 15 साल की राजाबाई जो पहली बार मां बनने जा रही है टीका लगवाने पहुंची तो बहुत घबरा रही थी। उससे जब पूछा कि इतनी कम उम्र में तुम्हारी शादी हो गई तुम्हे कैसा लगता है तो उसका जवाब था हमारे यहां ऐसा ही होता है। गांव में संपन्न परिवार के बच्चे ही पढने जाते है मजदूर वर्ग व अतिगरीब परिवार के बच्चे तो थोडा बहुत पढकर पढाई छोड देते है। जैसे ही लडकी कुछ बडी लगने लगती है उसकी शादी की बात शुरू कर दी जाती है और कब वह बच्चों की मां बन जाती है उसे भी पता नहीं चलता। गांव में सब कुछ अंदाजे से किया जाता है। गांव में आज भी जमकर बाल विवाह हो रहे है। जब मुख्यमंत्री द्वारा चलाए जा रहे कन्यादान योजना में नाबालिक लडकियों की शादी के मामला उभर कर सामने आए तो गांव की वास्तविकता क्या होगी इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
होशंगाबाद और छिंदवाडा के गांवों मंे भ्रमण करने पर वहां की महिलाओं को बहुत करीब से जानने का मौका मिला। गांव की महिलाएं दुनियादारी से बहुत दूर है। बचपन से ही बडी-बडी जिम्मेदारियों को संभालने के कारण वे अपने स्वाथ्य का ख्याल नहीं रख पाती है और इसी का नतीजा है कि हमारा देश महिलाओं और बच्चों से संबंधित बीमारियों में अव्वल है। बचपन से ही उम्र के मुताबिक पोषण आहार नहीं मिलने के कारण और स्वास्थ्य का ख्याल नहीं रखपाने के कारण बच्चों में कुपोषण और महिलाएं एनीमिया और हिमोग्लोबिन की कमी का दंश झेल रही है । लडकियों की उम्र से पहले शादी हो जाने और गर्भवति होने पर कई तरह की समस्याएं से दो-चार होना आम बात हैै। इसी के कारण मातृत्व और शिशु मृत्यु दर को लक्ष्य में खास कमी नहीं आ पा रही है। सामान्य दिन हो या गर्भवस्था के दौरान दोनों ही समय में महिलाओं का वजन उनकी उम्र से कम ही पाया जाता है। विभिन्न ग्रामों के टीकाकरण कार्यक्रम कवर करने के पर महिलाओं के स्वास्थ्य को करीब से जानने का मौका मिला। ग्रामों में ज्यादातर महिलाओं का वजन उनकी उम्र से कम ही पाया गया और लगभग सभी में हिमाग्लोबिन की कमी भी थी। पिपरिया विकासखंड के ग्राम तरौनकला की एएनएम ने बताया कि यदि खून का रंग लाल नहीं होता फिका सा होता है तो उसमें हिमोग्लोबिन की कमी है और मेरे सामने बनाई गई लगभग सभी स्लाइड का रंग फीका ही था । टीका लगवाने आई रेखा दुबे गर्भवति है जब उन्होंने अपना वजन किया तो 45 किलो निकला जबकि उनका कहना था कि पिछले महिने भी उनका वजन 45 किलो ही था । जबकि गर्भ के दौरान हर महिने वजन बढ जाता है वहीं भागवती बाई 27 साल की है और उनका वनज मात्र 35 किलो ये तो चंद उदाहरण हैं गांव की अधिकतर महिलाओं का वजन अपनी उम्र से काफी कम होता है। इस तरह की महिलाएं ही हाई रिस्क में आती है, लेकिन उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता और यह उन्हीं 15 प्रतिशत में शामिल है, जिनके केस बिगड सकते हैं।
भारत की आबादी में आधे से अधिक महिलाएं और 24 प्रतिशत पुरूष एनीमिया के शिकार है। राष्टीय परिवार सर्वेक्षण के मुताबिक एनीमिक महिलाओं का प्रतिशत बढता जा रहा है। जहां एनएफएचएस 2 में 52 फीसदी शादी शुदा महिलाएं एनीमिक थी वहीं एनएफएचएस 3 में 56 हो गई। वहीं एनएफएचएस 2 के मुताबिक 50 प्रतिशत गर्भवति महिलाएं एनीमिक थी और एनएफएचएस 3 में बढकर 59 हो गया है । एनएफएचएस 3 के मुताबिक मध्यप्रदेश में 6 से 35 माह के 82.6 प्रतिशत बच्चे एनिमिक पाएं गए जो एनएफएचएस 2 में 71.3 थे ।

Friday, August 20, 2010

बेरोजगारी और अस्वस्थता

स्वस्थ समाज की कल्पना में बेरोजगारी सबसे बडा रोढा है । जब भर पेट खाना नसीब नहीं होगा तो व्यक्ति के स्वस्थ रहने की कल्पना करना बेमायने है । देश में बेरोजगारी की दर करीब 10.7 है बेरोजगारी के मामले में भारत 155 वे स्थान पर है । यानि इतने लोग रोजाना रोटी की जुगत में दिन कांटते है कभी पेट में अन्न के दो दाने चले जाते है तो कभी खाली पेट ही नींद को बुलाना पडता है । गरीबों को रोजगार देेने के लिए सरकार ने नरेगा की शुरूआत तो की लेकिन जमीनी स्तर पर पडताल करने पर पता चलता है कि जरूरतमंदों को ही इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है । जब इस योजना के बारे में पिपरिया ब्लाक के समीस्थ ग्रामों में जाकर जायजा लिया तो हाल काफी बेहाल नजर आएं । पिपरिया के समीस्थ ग्राम तरौनकला में अधिकतर लोगों के पास जाॅब कार्ड तो बने है , लेकिन सिर्फ नाम के लिए । इसके तहत वर्ष 2009 में किसी को तीन दिन काम मिला तो किसी को पांच दिन और कई लोगों ने बताया कि जितना काम किया उतना पैसा भी नहीं मिला । हरीपाल कार्ड क्रमांक 0503 के जाॅब कार्ड देखने पर पता चला कि पिछले साल उसमें करीब तीन दिन के लिए काम मिला । हरीपाल कहते है कि मंै तो बांस से टोकनी व सूपा बनाने के अपने पैतिृक कार्य करता हूं, लेकिन आजकल बांस नहीं मिलने के कारण रोटी की तलाश के लिए सरकारी योजना में काम की तलाश में लगा रहता हूं लेकिन इसके सहारे भी रोजी-रोटी नहीं चल पा रही है । उसने बताया कि रोजगार नहीं मिलने और ध्ंाधा नहीं चल पाने के कारण परिवार का पेट पालना बहुत मुश्किल हो गया है ।
प्रिवार में कमाने वाला मंै ही हूं बांस मिल जाते है तो मेरी पत्नी भी काम में मेरा सहयोग कर करती है । अब राशन काॅर्ड ही एक मात्र सहारा है, लेकिन उसमें भी 30 किलों के बजाय सिर्फ 20 किलों अनाज मिलता है पिछले 4-5 महिने से तो चावल मिल ही नहीं रहा । इतने में अच्छे से गुजारा नहीं हो पाता है । यहीं कारण है कि गांव में महिलाओं में एनीमिया की शिकायत रहती है जब माता को ही अच्छा व पर्याप्त भोजन नहीं मिलेगा तो बच्चा तो कुपोषित होगा ही । आंगनबाडी में भी महिलाओं को सिर्फ पोषण दिवस के दिन ही खिचडी या हलवा मिलता है । वहीं मुन्नालाल जिसका पंजीयन क्रमांक 0382 है उसका तो अभी तक खाता भी नहीं खुल पाया है । इस योजना के तहत उसे अभी तक काम नहीं मिला है ।
जहां तक बजट का सवाल है तो पिपरिया ब्लाॅेक का लेबर बजट वर्ष 2009-10 में 5 करोड 35 लाख रूपए था जिसमें से 2 कर्रोड 680 लाख रूपए का उपयोग हुआ । वर्ष 2010-11 के लिए 5 करोड 60 लाख का बजट आया है । पिपरिया की 53 ग्राम पंचायतों में 27,643 जाॅब कार्डधारी हैं, जिनमें से 3 हजार 761 मजदूरों ने अब तक काम किया है । इस योजना के तहत 456 कामों का लक्ष्य था इसके विपरीत कुल 134 काम ही हो पाए है ।ग्राम तरौनकलां में 889 गरीबी रेखा के अंतर्गत आने वाले ऐसे परिवार है जो नरेगा के तहत पंजीबद्व है । जबकि काम करने वालों की संख्या 2230 है जिनमें से सिर्फ 8.07 फीसदी लोगों के ही एकाउंट खुले हैं । ग्राम के सचिव से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2008-09 में कुल 100 लोगों ने ही इसके तहत काम किया । गांव में यह योजना क्यों फैल हो रही है इस संबंध में पंचायत के सरपंच व सचिव इसका सीधा जिम्मेदार लोगों को ही ठहरा देते है उनका कहना है कि लोग इस योजना का लाभ ही नहीं उठाना चाहते वहीं दूसरी ओर लोगों का कहना है कि कौन भूखा मरना चाहता है यदि काम मिलेगा तो हम क्यों नहीं करेंगे । जब काम ही नहीं देंगे तो हम कैसे करेंगे ।
स्वास्थ्य का सीधा संबंध भरपेट भोजन से है जब तक भरपेट भोजन नहीं मिलेगा तब तक आदमी स्वस्थ कैसे रह सकता हैं । रोजगार नहीं होने के कारण ही बीमारियों का ग्राफ बढता जा रहा है । मातृत्व मृत्यु और शिशु मृत्यु दर के लिए भी कहीं न कहीं यह जिम्मेदार है । गर्भावस्था के दौरान मां को अपने और बच्चे दोंनों के लिए आहार लेना होता है, लेकिन उसे अपने लिए ही पेट भर भोजन नहीं मिल पाात तो बच्चा तो दूर की बात है । समय पर वह संतुलित आहार नहीं मिलने के कारण लोग विभिन्न बीमारियों का शिकार हो जाते है यदि बीमारियों और मृत्यु को रोकना है तो सबसे पहले बेरोजगारी को मिटाने की पहल करना होगा ।